THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA INDIA AGAINST ITS OWN INDIGENOUS PEOPLES

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Monday, April 1, 2013

सामान्य गुजरात बनाम मोदी का गुजरात

टूटे बिखरे ग़ज़ा में ज़िंदगी के धक्केः यात्रा वृतांत

टूटे बिखरे ग़ज़ा में ज़िंदगी के धक्केः यात्रा वृतांत

-जमाल महजूब :: प्रस्तुति और अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

अमेरिका ईरान गतिरोध के बीच इज़रायल की युद्ध पिपासा रह रह कर भड़क उठ रही है। इधर उसकी आवृत्तियों में असाधारण तेज़ी आई है। इज़रायल हर दूसरे तीसरे दिन दुनिया को चीखते हुए बताता है कि ईरान ने अपना बम बना डाला। उसका नामोनिशान मिटाने पर आमादा इज़रायल की ईरान के प्रति घृणा को जब कोई मुकम्मल आसरा नहीं मिलता तो इज़रायल अपनी भड़ास अपने क़रीब बसे उस छोटे से भूगोल के बाशिंदो पर निकालता है जो एक देश होना चाहते हैं लेकिन कई दशक बाद भी अघोषित गुलामों की ज़िंदगी बसर करने को मजबूर हैं।

ग़ज़ा के बारे मे बहुत कुछ कहा जा चुका है, लिखा जा चुका है। संयुक्त राष्ट्र में इस बारे में नाना ढोल बजाए जा चुके हैं। हज़ारों लाखों फ़ाइलें इधर से उधर खिसका दी गई हैं। लेकिन एक संभावित देश के संभावित शहर में इज़रायली दमन जारी है। फ़लिस्तीनी लड़ाई जारी है और उसके अपने अंतर्विरोधों के बीच संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और "मित्र देशों" ( जिनकी संख्या इधर अलिखित तौर पर बहुत हो गई है-मामला क़रीब क़रीब एकतरफ़ा ही है) ने फ़लिस्तीन को अलग राष्ट्र का दर्जा देने के बारे में तमाम प्रस्तावों को दरकिनार किया हुआ है। अंतरराष्ट्रीय सौहार्द के नाम पर फ़लिस्तीनी झंडा संयुक्त राष्ट्र में लहराता है लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक ख़ुराफ़ातों की जघन्यताओं वाले इस दौर में उसकी फड़फड़ाहट किसी राष्ट्रीय गरिमा या अस्मिता की बुलंदी नहीं बताती, वो महज़ नवउपनिवेशवादी शांति के मसीहाओं के लिए पंखा झलने जैसी ठकुराई के हवाले हो गया है।

ग़ज़ा इसी संभावित राष्ट्र का एक शहर है जो इज़रायल के क़ब्ज़े में महज़ एक बंद गली बनकर रह गया है। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को ठेंगा दिखाकर इज़रायल जैसे अहंकारी और उत्पाती देश ने ग़ज़ा की नाकाबंदी की हुई है। और हैरानी है कि इस नाकाबंदी को हटाने के लिए उसके ख़िलाफ़ किसी का ज़ोर नहीं है। भारत जैसे महान सभ्यता संस्कृति वाले और तीसरी दुनिया के प्रतिनिधि देश का भी नहीं जो अपने अंतर्विरोधों से इतना घिरा है कि उसकी विदेश नीति एक अंधकार से निकलकर दूसरे अंधकार में ठोकरें खा रही हैं। गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन में पिछले दिनों भारत ने हौसला दिखाया कि ईरान के कार्यक्रम पर अमेरिका विरोधी लाइन पेश की। ये गुटनिरपेक्ष देशों की लाइन बनी। कोई पूछे कौन कैसा गुटनिरपेक्ष। ईरान से गैस पाइप लाइन स्थगित है, उससे तेल खरीदना कम कर दिया गया है। अमेरिका का डर है। और गुटनिरपेक्ष जैसे लगभग मृत मंच से ईरान के एटमी कार्यक्रम की अनुशंसा। आखिर इसमें क्या बिगड़ता है। यथार्थ सब जानते हैं। अमेरिका से बेहतर भला कौन जानता है। तो ये हैं अंतर्विरोध। भारत की विदेश नीति ग़ज़ा में दमन की सिद्धांततः निंदा करती है लेकिन इज़रायल को फटकार नहीं लगाती, आगे बढ़कर उसपर दबाव नहीं डालती। या दबाव के समर्थन में कोई अंतरराष्ट्रीय प्रयास नहीं करती है। ये मानो एक सुविधापरस्त, मौक़ापरस्त और फ़ायदे के हिसाबकिताब वाली नीति है।

ग़ज़ा के बारे में इतना कुछ पढ़ने देखने के बाद हैरानी होती है कि आख़िर वे लोग किस मिट्टी के बने हैं जो राख़ के बीच भी किसी तरह सिर उठाए जी रहे हैं। उन पर कितनी कितनी किस्म की मुश्किलें और बरबादी बरसी हुई हैं।( 2009 का इज़रायल दमन अभियान भला कैसे भुलाया जा सकता है) फिर भी फिर भी वो कौनसी जीवटता है जिससे टूटा हुआ बिखरा हुआ ग़ज़ा अपनी मिट्टी में पल रहे जीवन को धक्का देता ही रहता है और वो चलता ही रहता है। ये कैसा विलक्षण धक्का है।

इज़रायल के दमन के समांतर उस चरमपंथी गुट हमस का भी दमन तंत्र ग़ज़ा में जारी है जो अपने ढंग से अपने सरवाइवल और अपनी राजनीति की कीमत वसूल कर रहा है। दूसरी ओर पश्चिमी तट और रामल्ला वाला फ़लिस्तीनी हिस्सा आज़ादी और अस्मिता का राग तो गाता आ रहा है लेकिन वो अमेरिका और मित्र देशों के लिए स्टॉप गैप इंतज़ाम की तरह काम करता है। उसके पास शासन चलाने का न तो जुनून है और न ही दमन के प्रतिरोध की वैसी रीढ़। ग़ज़ा की बेजार गलियों में मानो ये सारी बदक़िस्मतियां चक्कर काट रही हैं।

वक़्त और राजनीति और क्रूरता और अन्याय और उनके समांतर ज़िंदगी की उदासियों, चुप्पियों और रौनकों को देखने इसी साल कुछ महीने पहले लेखकों के एक दल के साथ ग़ज़ा पहुंचे थे युवा उपन्यासकार जमाल महजूब। उन्होंने चार दिन की उस यात्रा का वृतांत गुएर्निका नाम की प्रतिष्ठित ऑनलाइन पत्रिका के लिए लिखा। वहां मूल अंग्रेज़ी में प्रकाशित वृतांत का ये साभार हिंदी रूपांतर है। जमाल महजूब सूडानी मूल के ब्रिटिश लेखक हैं। उनकी मां ब्रिटिश और पिता सूडानी हैं। उनका जन्म लंदन में हुआ। वे ख़ारतूम में भी पले बढ़े। अपने देश सूडान को स्मृतियों का आनुवंशिक फ्रिंगरप्रिंट मानने वाले जमाल इन दिनों स्पेन में रहते हैं। जमाल महजूब की कहानियां और निबंध द गार्जियन, द टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट, ली मोंदे, डि ज़ाइट समेत दुनिया भर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और उन्होने कई ईनाम जीते हैं। हाल के दिनों में पार्कर बिलाल नाम से उन्होंने अपराध फ़िक्शन की ओर क़दम बढ़ाया है। उनका उपन्यास द गोल्डन स्केल्स 2012 में ब्लूम्सबैरी, अमेरिका से प्रकाशित हुआ है।

West_Bank_&_Gaza_Map_2007_(Settlements)ग़ज़ा पट्टी के निवासियों पर गतिविधि की पाबंदी है। वे अपनी ज़मीन पर क्या ला सकते हैं या वहां से क्या बाहर भेज सकते हैं, यहां तक कि अपने समंदर में वे कितनी दूर तक मछली पकड़ सकते हैं, इन सब पर पाबंदियां हैं। लेकिन शब्द किसी सीमा को नहीं जानते।

जैसे ही हम "वेल्कम टू ग़ज़ा" साइनबोर्ड के नीचे से गुज़रे, पूरी बस में उत्साह की लहर दौड़ गई और हर कोई उस पल को क़ैद करने के लिए अपने टेलीफ़ोन पर झपटा। तीन घंटे राफ़ा बॉर्डर क्रॉसिंग पर वक़्त काटना पड़ा। इस दौरान मिस्र के अफ़सरान ये तै कर रहे थे कि हमें आगे जाने दिया जाए या नहीं (मिस्र के आंतरिक मंत्रालय ने ग़ज़ा जाने की इजाज़त हमें नियत तारीख़ से एक दिन पहले ही दी थी।) काहिरा से आठ घंटे की ड्राइव के बाद ये जीत ही लगती थी कि यहां तक तो आ पहुंचे।

हमारे दल से दो लेखकों को प्रवेश की मनाही कर दी गई। उन्हें ज़रूरी क़ागज़ात जुटाने के लिए काहिरा लौटना पड़ा। यहां आने के लिए राज़ी होते हुए भी हम सब जानते थे कि हो सकता है हमें ग़ज़ा जाने ही न दिया जाए। "पैलफ़ेस्ट" के साथ ये मेरी तीसरी यात्रा थी। 2008 में पश्चिमी तट की यात्रा के साथ ये साहित्यिक रोड शो शुरू हुआ था। पैलफ़ेस्ट यानी पैलीस्टीन(फ़लीस्तीन) साहित्यिक उत्सव का मक़सद है- साधारण फ़लीस्तीनियों के अलगाव को तोड़ना और सांस्कृतिक गतिविधियों, परिचर्चाओं, रचनापाठों और वर्कशॉप के ज़रिए उनसे संपर्क क़ायम करना। फ़लिस्तीन दौरे के हर मौक़े पर, अनिश्चितता का साया पूरे मुआमले पर हमेशा मंडराता रहा। ग़ज़ा शहर की ओर बढ़ते हुए फ़िजां में रात भरने लगी थी जो एक सामान्य बात ही थी। और हो भी क्यों न।।।।। खजूर के पेड़ों की छिटपुट कतार और ओलिव पेड़ो का संकरा झुरमुट उस देहाती रोमान की याद दिलाता था जो कुछ समय पहले के अतीत में ढह चुका था। हम मिस्र में नहीं हैं, इस बात की पहली निशानदेही उन गैस स्टेशनों से मिलती थी जहां वाहनों की कतार लगी हुई थी और तीन कारों की चौड़ाई जितनी सड़क पूरी भरी हुई थी। 2008 से ईंधन आयात पर लगभग पूरा प्रतिबंध है। ये कतारें और बिजली कटौतियां(जो बारह बारह घंटो तक गुल रह सकती थी) छिटपुट और अनिश्चित आपूर्ति के बारे में बताती थीं।

ग़ज़ा पट्टी के बारे में जो ग़ौर करने वाली बात है वो है साक्षात सेना की ग़ैरमौजूदगी। पश्चिमी तट में चेकपोस्टों और क्रॉसिंग्स पर, इज़रायली सैन्य बल अपनी कसी हुई हरी वर्दियों में तैनात रहते हैं। उनके पास हरदम तैयार स्वचालित राइफ़लें हैं। वे युवा हैं, उनमें से कुछ किशोर उम्र के हैं, क़ाग़ज़ात और आवाजाही के आदेश तलब करते हुए वे अपने कंधों पर हथियारों को गिटार की तरह उठाए रहते हैं। 2008 में येरुशेलम और रामल्ला के बीच कालान्दिया क्रॉसिंग पर, मैं उस गेट की छड़ों और जालियों की भूलभुलैया में फंस गया था जो एक बार में एक के ही निकलने के लिए बने होते हैं। मेटल डिटेक्टर और एक्सरे मशीनों से पार होने की कोशिश जो थी सो अलग। मैं घिसटता हुआ आगे बढ़ा ही था कि लाउडस्पीकरों पर हिब्रू में चिल्लाहटें गूंजने लगीं। ये साफ़ नहीं था कि वे क्यों और किस पर चीख रहे थे। मैंने दर्द में तड़पते एक अधेड़ आदमी को देखा। उसे वापस जाने के लिए कहा जा रहा था। उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की कोशिश में आई उसकी पत्नी और जवान बेटी बिलखती थी। हेब्रॉन में सेना पूरे लड़ाका पोशाक और साजोसामान से लैस होकर गश्त करती है। सिर पर हेलमेट, शरीर पर कवच और रेडियो सेट और बच्चे अपनी साइकिलों में उनके इर्दगिर्द वैसे ही मंडराते हैं जैसे हर जगह के बच्चे।

चालीस किलोमीटर लंबी और औसतन एक चौथाई से कुछ कम चौड़ी ग़ज़ा की पट्टी में सैन्य मौजूदगी नहीं दिखती लेकिन वो है तो है ही। ग़ज़ा शहर में अपने होटल की छत के टैरेस से मैं दूर समंदर में रोशनी के तीखे, सफ़ेद धब्बों की कतार देखता हूं। मुझे ये समझने में कुछ वक़्त लगता है कि उजाले के ये गुच्छे पानी पर तैरने वाले निशान हैं। पिछले कई वर्षों से फ़लिस्तीनी मछुआरों के लिए मछली पकड़ने का दायरा तै कर दिया गया है। ओस्लो संधि में बीस नॉटिकल मील की छूट दी गई थी। लेकिन वास्तव में ये मछुआरे ज़्यादा से ज़्यादा तीन नॉटिकल मील तक ही जा सकते हैं। इज़रायल ने ये बंदिश जनवरी 2009 में लागू कर दी थी। इस तरह ग़ज़ा के समंदर के 85 फ़ीसदी हिस्से पर स्थानीय मछुआरों का हक़ नहीं है। 2000 में यहां दस हज़ार मछुआरे थे और आज साढ़े तीन हज़ार ही रह गए हैं। उन रोशनियों से मछलियां खिंची हुई सतह पर चली आती हैं, इसका अर्थ ये होता है कि मछली पकड़ने की सबसे मुफ़ीद जगह उस लाइन के क़रीब ही है जिसके पार जाने की मनाही है। लेकिन ये एक ख़तरे वाला काम है। इज़रायल के गश्ती जहाज मछली पकड़ने वाली छोटी नावों के इर्दगिर्द चक्कर काटते रहते हैं। और नियमित रूप से उन पर ज़िंदा बारूद से फ़ायर भी झोंक देते हैं।

इतिहासकार इलान पापै ने, ग़ज़ा में जो हो रहा है, उसे "धीमी गति का जनसंहार" कहा है। कहने को क़ब्ज़ा 2005 में ही ख़त्म हो गया था जब 21 बस्तियां हटा दी गई थीं और इज़रायली, गज़ा पट्टी से निकल गए थे। वापसी में कई इमारतें ध्वस्त कर दी गईं थीं, कुछ मकान और यूनिवर्सिटी का कुछ हिस्सा रह गया था। ग़ज़ा पट्टी की नाकाबंदी का ये पांचवां साल है। चीज़ों का आयात निर्यात, वायु, जल या थल मार्ग से लोगों की आवाजाही, ईंधन, दवाइयों और पानी पर कड़े प्रतिबंध हैं। हमस ने फ़लिस्तीनी विधायी परिषद पर नियंत्रण हासिल किया और उसकी प्रतिक्रिया में इज़रायल ने ये सब पाबंदियां लगा दीं। इस काम में मिस्र ने इज़रायल की मदद की है जो हमस को समर्थन करता हुआ नहीं दिखना चाहता है, हो सकता है मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड का राष्ट्रपति बन जाने से अब उसके रवैये में कुछ फ़र्क आए।

न्युयार्क टाइम्स ने नाकाबंदी को "सामूहिक सज़ा" बताया है। निश्चित रूप से ग़ज़ा में रहने वाले साढ़े दस लाख लोगों के लिए ज़िंदगी मुश्किल हो गई है, इनमें से 49 फ़ीसदी लोग तो आधिकारिक तौर पर बेरोज़ग़ार हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक वहां जीवन स्तर का ग्राफ़ 1967 के स्तर पर पहुंच गया है। विडंबना ये है कि इस नाकाबंदी से हमस मज़बूत हुआ है। आयात पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध और ईंधन की किल्लत से अर्थव्यवस्था सिकुड़ गई है और इसके समांतर मिस्र की सीमा के नीचे सुरंगों के ज़रिए गुप्त कारोबार से राजस्व उगाही की जा रही है। ये सब हमस के नियंत्रण में है।

मैं इन ख़बरों पर निगाह रखता रहा हूं। राजनैतिक संघर्ष, नाकाबंदी के नतीजे, रॉकेट हमलों की निरर्थकता, ऑपरेशन कास्ट लीड के विनाशकारी असर और फ़्रीडम फ़्लोटिला पर आक्रमण। ग़ज़ा नाकाबंदी का समानार्थी बन गया है। इसमें पश्चिमी तट से ज़्यादा, दुनिया की सबसे बड़ी खुली जेल का विचार निहित है। यहां रहने वालों की ज़िंदगियों के बारे में ज़ाहिर है, मैं बहुत कम जानता था।

ग़ज़ा के चार विश्वविद्यालयों में इस्लामी यूनिवर्सिटी के पास बेहतरीन फ़ंड हैं। ये भी है कि अकेली यही है जो सेक्युलर नहीं हैं। पहले दिन, हमें अलगथलग पड़े कैंपस का दौरा कराया गया, हम महिलाओं के सेक्शन में जा घुसे तो हमारे पुरुष गाइड खिलखिलाने लगे। अहाते करीने से चमकाए गए हैं। वे पेड़ों से सजे हैं जो बड़ी, आधुनिक इमारतों के बीच खड़े हैं। इनमें तीन मंज़िला लाइब्रेरी भी है। 2009 में दो इमारतों पर बम गिराए गए थे लेकिन अब उन्हें फिर से पूरी तरह बना दिया गया है। बरबादी और किल्लत के कोई निशान नज़र नहीं आते। मैं इस बारे में अपने गाइडों से दरयाफ़्त करता हूं तो मुझे बताया जाता है कि उनके पास साजोसामान लाने के "अपने तरीके" हैं।

ठसाठस भरे लेक्चर हॉल में दो अन्य लेखकों के साथ मैं ख़ुद को ज़्यादातर युवा औरतों के जमघट के सामने पाता हूं। कमोबेश सभी रंगबिरंगे हेडस्कार्फ़ और सादे धूसर या काले "जिलबाब" पहने हुए हैं। अंग्रेज़ी बोलने की रफ़्तार अलग अलग है और यूं वे हमारे दौरे के बारे में बहुत उत्साह दिखाती हैं फिर भी ये साफ़ नहीं है कि वे हमसे क्या चाहती हैं। ये सत्र बतौर वर्कशॉप रखा गया था लेकिन तवारुफ़ के एक सिलसिले के बाद मैं देखता हूं कि छात्र असल में जो चाहते हैं वो है बात करना।

हमें पूछे गए ज़्यादातर सवाल हमारी मंशा को समझने की कोशिश हैं। हम लोग यहां क्यों आए हैं। हमने क्या सोचा था कि क्या मिलेगा। मैं कुछ कुछ बेयक़ीनी, यहां तक कि नाख़ुशी महसूस करता हूं। "जिलबाब" और हेडस्कार्फ़ पहने इन लड़कियों को देखकर लगता है कि वे आश्रित जीवन जीती हैं। लेकिन इसके उलट वे बेहिचक होकर बातचीत करती हैं, मैं इस बात को पसंद करता हूं। उनमें से कई पहले से लिखती हैं। दो लड़कियों ने आगे आकर अपनी कविताएं पढ़ीं। बोलने के लिए इजाज़त मिलने का वे इंतज़ार नहीं करती हैं। जैसे दुनिया में सब जगह हर कक्षा में छात्र जिज्ञासु हैं, वे भी सुनना चाहती हैं कि हम अपना काम कैसे प्रकाशित करा पाते हैं और वे कैसे अपनी कहानियां दुनिया के सामने पेश कर सकती हैं। वे एक अजीबोग़रीब और आपात हालात की चश्मदीद हैं। आख़िर में, हम जाने को निकलते ही हैं कि बहुत सारी लड़कियां हमारे इर्दगिर्द जुट आती हैं और अपने एक सवाल का जवाब पा लेना चाहती हैं। मुझे क्या लिखना चाहिए। मैं वही सलाह दोहराता हूं जो ऐसी स्थितियों में हमेशा देता रहा हूं- लिखो, तुम बस लिखो और लिखते ही रहो।

दिन के वक़्त, जब रोशनियां बंद हैं, समंदर खाली और शांत है। होटल के टैरेस पर टाइटेनिक फ़िल्म के टाइटल गीत का विवियन बशहरा का अरबी संस्करण बजाया जा रहा है। रसीली धुन के ऊपर दूर कहीं लगातार कुछ चटखने की आवाज़ गूंजती है। ये इज़रायली लड़ाकू जेट विमानों की गूंज है। ख़ामोश मौक़ो पर मैं कल्पना करता हूं कि मैं एक टोही विमान ड्रोन की मद्धम भिनभिनाहट सुन सकता हूं। शहर का चक्कर लगाते हुए हम अल अंदलस टावर पर रुके। ये स्थानीय लैंडमार्क है। 2009 में ऑपरेशन कास्ट लीड के दौरान ये इज़रायली हमले का निशाना बना था। अपार्टमेंट की इमारत ग़ज़ा में सबसे ऊंची इमारतों में से है, उस पर इज़रायली जहाज ने समंदर से गोलाबारी की थी। 22 दिनों तक चली हमले की उस कार्रवाई में ये इमारत बरबादी के सबसे असाधारण उदाहरणों में से है। लोहे की मुड़ीतुड़ी छड़ों में कंक्रीट के फ़र्श झूल रहे हैं, ताश के पत्तों की ढहती हुई मीनार की तरह जो किसी तरह बीच हवा में अटकी है। मुझे बताया जाता है कि इसे फिर से बनाया जा रहा है तो मुझे एकबारगी यक़ीन नहीं होता।

GAZA_devastationऔर भी निशान हैं, नेस्तनाबूद इमारतें, यहां वहां बिखरी हुई, लेकिन नुकसान के पैमाने को देखते हुए ये ख़ासा ग़ौर करने लायक है कि कितना कुछ फिर से बना दिया गया है। (संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि सत्रह हज़ार इमारतें आंशिक रूप से नष्ट हुई थीं, चार हज़ार पूरी तरह और क्रंक्रीट का छह लाख टन मलबा हटाया गया था।) सरायेवो में युद्ध ख़त्म होने के दस साल बाद भी इमारतों पर गोलियों से बने छेद और बम के टुकड़ों के दाग जस के तस हैं, मानो सरायेवो के लोगों को डर था कि जो उन्होंने भुगता है उसे भुला दिया जाएगा। इधर ग़ज़ा में, संसाधनों की कमी के बावजूद, फ़लिस्तीनी अथक निर्माण और पुनर्निर्माण कर रहे हैं, मानो मनुष्य के तौर पर उनका अस्तित्व उनकी शारीरिक अदम्यताओं पर ही निर्भर रह गया हो। मुझ जैसे बाहरी व्यक्ति को वे मरम्मत और बरबादी के निराशा भरे चक्कर में फंसे हुए दिखते हैं।

राफ़ा को जाने वाला तटीय रास्ता, समंदर से बाड़े की तरह लगी रेत की पतली पट्टी के किनारे किनारे गुज़रता है। हमारा गाइड बताता है कि ये पानी नहाने लायक नहीं है। मशरत मे इसकी वजह साफ़ हो जाती है, जहां से गुज़रते हुए सीवेज की बहुत तीखी दुर्गंध मेरी नाक से टकराती है। ग़ज़ा में पानी एक गंभीर मुद्दा है। पानी की सफ़ाई के लिए "कोस्टल एक्वीफ़र" के ग्राहक बहुत ज़्यादा हैं और साफ़ पानी की निकासी लायक उसे पर्याप्त रूप से भरा नहीं जाता है। जल शोधन संयंत्रों की बरबादी और ज़रूरी औजारों के आयात पर प्रतिबंध का मतलब ये है कि बड़ी मात्रा में नालियों का मलबा जल व्यवस्था मे बहता आ रहा है, जिससे एक्वीफ़र प्रदूषित होता है और फिर जिसकी वजह से स्वास्थ्य समस्याएं आती हैं।

ये बेशकीमती ज़मीन है। समृद्ध और उर्वर। ग़ज़ा के लोग अमरूद, संतरे और अंगूर उगाते हैं। हम लोग खजूर के पेड़ों के झुरमुट से ग़ुज़रे। दाउर अल-बलाह शरणार्थी शिविर का नाम इन्हीं से है। हम लोग संयुक्त राष्ट्र के बनाए एक स्कूल से गुज़रे, हवाई हमलों से बचाने की कोशिश के तौर पर जिसकी इमारत पर नीला और सफेद रंग पोता गया है। वहां बसें नहीं हैं और कुछ बच्चों को तीस मिनट पैदल चलकर स्कूल पहुंचना होता है। सड़क संपर्क काटने के लिए, वक़्त बेवक़्त इज़रायली नदी के पानी का बहाव रोकने वाला फाटक खोल देते हैं। पश्चिमी तट जाने वाले ग़ज़ा के लोगो और वहां से आने वाले बाशिंदों के लिए यही नीति लागू है। पश्चिमी तट के दायरे में, मिसाल के लिए बेथलेहम में पंजीकृत फ़लिस्तीनियों को येरुशेलम जाने की मनाही है। जो नौ किलोमीटर की दूरी पर है।

राफ़ा में हम राशेल कॉरी सेंटर का दौरा करते हैं, जहां बच्चों के लिए गतिविधियां की जाती हैं और चिकित्सा मदद दी जाती है। कॉरी अंतरराष्ट्रीय सॉलिडैरिटी मूवमेंट की एक्टिविस्ट थीं। 2003 में उनका निधन ग़ज़ा में हो गया था। उन्हें इज़रायली बुलडोज़रो ने कुचल दिया था। फ़लिस्तीनी घरों को ढहने से बचाने के लिए वो बुलडोज़रों के आगे जा खड़ी हुई थीं। स्कूल से बाहर बच्चों के जाने के लिए कोई जगह नहीं है। यहां उनके पास नाटकों में अभिनय करने का मौक़ा है, चित्र बनाने का और रंग भरने का। व्यवहार में असामान्य बच्चों की शिनाख़्त की जाती है और उनके लिए बाल मनोचिकित्सक रखे गए हैं।

इस सेंटर से निकलकर हम सीमाई इलाक़ा देखने के लिए शहर के किनारों की ओर निकले। वहां एक फटेहाल टेंट और भद्दे ढंग से वर्दी पहना आदमी था जिसके हाथ में एक घिसापिटा नोकिया और एक-47 थी। बॉर्डर के किनारे बने कई मकानों को इज़रायलियों ने 2009 में ध्वस्त कर दिया था। कुछ बच्चे हमारे साथ साथ हो लिए और चहक चहक कर बताने लगे कि कौन से मकान फिर से बन गए हैं। उनके लिए सब कुछ बहुत पुराने ज़माने की ही बात है। एक छोटे बच्चे की स्मृति ऐसी होती है। एक दिन वे सारी बातें जान जाएंगें, लेकिन अभी तो ये उनके लिए एक खेल ही है।

भारीभरकम ट्रक धूल के बादलों से गड़गड़ाते हुए निकले और आगे की गलियों में ग़ायब हो गए। इन ट्रकों की रफ्तार से उठी धूल की आंधी जब रुकी तो हमारी गली अटपटे ढंग से ख़त्म हो चुकी थी। गार्ड चौकी बम से तबाह है जहां मुट्ठी भर पुलिसकर्मी तैनात हैं, वे खाना खा रहे थे। हमने उन्हें डिस्टर्ब कर दिया। सेम से भरा टीन का कटोरा और थोड़े से ब्रेड के टुकड़े नंगी टेबल पर पड़े हैं। वहां कोई दीवार नहीं है, कोई दरवाज़ा नहीं, तीखी हवा को रोकने के लिए कुछ भी नहीं। हमारे कैमरों के बारे में कुछ सुगबुगाहट होती है। हमने उन्हें चुपचाप किनारे रख दिया है। इस बीच वे अंदाज़ा लगा रहे हैं कि सैलानियों के इस ग्रुप का क्या करें। हमारे पैरों तले की ज़मीन सुरंगों से भरी हुई है। अटकलें हैं कि ऐसी हज़ारों सुरंगें हैं, 200 मीटर से लेकर क़रीब एक किलोमीटर तक की। इनके ज़रिए मिस्र से हर क़िस्म की चीज़ ग़ैरक़ानूनी ढंग से लाई जाती है। सटीक आंकड़ा स्तब्ध कर देने वाला है।

धूलोगुबार के बीच से मैं पनाहगाहों के झुरमुट का अंदाज़ा लगा सकता हूं। बम से तहसनहस इमारतों के बचेखुचे हिस्से जो सैंडविच की तरह चपटे हो गए हैं। कुछ लोहे की छड़ों और झूलते हुए कैनवास से बने कमज़ोर निर्माण हैं। आदमियों का एक दल एक खाली ट्रक से लगे ट्रेलर से जाता है। हमारे पास से गुज़रते हुए वे चहककर हाथ हिलाते हैं। आगे रेत की एक लहर उन्हें निगल लेती है। हम लोग तमाशा बन गए हैं। अंधेरो से खीसे निपोरते हुए प्रेत प्रकट हो उठते हैं। ये सुरंग खोदने वाले हैं। इन्हें देखकर लगता है कि मध्ययुग से आए हैं, सिर से पांव तक सफेद पाउडर में सने हुए। उनकी हर पलक और हर झुर्री, कान और बालों पर वो पाउडर पेंट की तरह चिपक गया है। वे हमें जाते हुए घूरते हैं।

पांवों के नीचे रेत नरम लगती है। हम एक शरणगाह के पास हैं जहां हमें अंधेरेपन के एक कुएं में झांकने की दावत दी गई है। चार मीटर व्यास वाला ये कुआं 24 मीटर गहरा है। नीचे जाने का एक ही तरीक़ा है। लकड़ी के दो तख्तों को चरखी से बांधकर और उनसे एक बिजली की मोटर को जोड़कर सीट बनाई गई है। हवा नहीं बहती। लिफ़्ट रुक गई है। और झूलती है। एक आदमी बताता है, बिजली चली गई। वो नहीं पूछता कि नीचे अंधेरे में कोई ऊपर आने का इंतज़ार तो नहीं कर रहा है।

कुछ सुरंगे चौथाई मीटर ऊंची हैं। जबकि कई इतनी ऊंची हैं कि लोग अंदर चल सकें। वहां कारें भी लाई जाती हैं, एक सुरंग ऐसी बताई जाती है जो 20 हज़ार डॉलर मिले तो कार को एक ही बार में यहां से वहां पार करा सकती है। ये सुरंगें नियमित रूप से ढहती रहती हैं, रेत के भुरभुरेपन को देखते हुए ये कोई हैरानी की बात भी नहीं है। अमेरिका की एक लीक केबिल(संदर्भ विकीलीक्स) के मुताबिक दो साल पहले मिस्र ने सुरंग निर्माण रोकने के लिए एक इस्पाती दीवार बनाई थी लेकिन ये बेअसर ही रही। सुरंगों को साफ़ करने के लिए बताते हैं कभी कभार मिस्र ज़हरीली गैस का रिसाव भी कराता है। तस्करी जोखिम भरा "उद्यम" है लेकिन इसकी बढ़िया भरपाई होती है। छोटी सुरंगे बनाने वाले लड़के एक दिन में सौ डॉलर कमा लेते हैं। चरखी चलाने वाले लोग उसका आधा कमा लेते हैं। वे सब कुछ ले आते हैं, दवाइयों से लेकर सीमेंट की बोरियों तक। ईंधन रबर पाइप से आता है।

विशाल ट्रक शीतल पेयों और स्नैक्स से लदे हैं। जो कुछ भी यहां से आता है, हमस उसपर टैक्स वसूल करता है। सुरंगों के बारे में राय बंटी हुई हैं। ग़ज़ा के कई लोग उनके ख़िलाफ़ हैं क्योंकि बॉर्डर के दोनों छोरों पर एक छोटे से समूह के लिए ही वे पैसा कमाती हैं। और, क्योंकि उनका इस्तेमाल हथियारों की तस्करी में हो सकता है, सुरंगें इसी कारण इज़रायल को पक्के बहाने मुहैया कराती हैं- नाकाबंदी जारी रखने के लिए और किसी भी वक़्त हमले को जायज़ ठहराने के लिए।

होटल लौटते हुए हम शहर में एक चौक पर रुकते हैं। इज़रायली जेलों में बगैर मुक़दमों के बंद हज़ारों फ़लिस्तीनियों की रिहाई के लिए यहां सामूहिक भूख हड़ताल चल रही है। चौक झंडो और बैनरों से पटा हुआ है। लाउडस्पीकरों से आवाज़ें चीखती हैं। बाद में बायकॉट और डाइवेस्टमेंट सोसाएटी(बीडीएस) के बारे में एक बैठक रखी जाती है। इसका मक़सद है- इज़रायली वस्तुओं, अकादमिक संस्थानों और खेल मुक़ाबलों में भागीदारी के अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार से इज़रायल पर दबाव बनाना। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़ात्मे में भूमिका निभाने वाले आंदोलन से प्रेरित होकर गठित किए गए बीडीएस अभियान का लक्ष्य है साधारण लोगों से जुड़ाव। और नेताओं से परहेज़।

हमारी आख़िरी शाम को पैलफ़ेस्ट का समापन कार्यक्रम सुरक्षा बलों ने बंद करा दिया। ये साफ़ नहीं है कि हमने किसके ख़िलाफ़ गुस्ताख़ी की, लेकिन हर चीज़ अविश्वास के जमा होते जाने की ओर इशारा करती है। उसी सार्वजनिक जगह पर जब आदमी और औरतें जमा होती हैं तो हमस उन्हें खदेड़ता है। हमारे इस रोड शो की ख़ास बात है-मिस्र का बेहद लोकप्रिय और बहुत प्रतिभाशाली संगीत ग्रुप एस्केनद्रैला। ये ग्रुप हमारे साथ ही यात्रा कर रहा है। दो रात पहले एस्केनद्रैला ने एक कंसर्ट पेश किया था जिसे ज़बर्दस्त ख़ुशी के साथ लोगों ने पसंद किया था। एस्केनद्रैला के क्रांति गीत पिछले साल काहिरा में ख़ूब गूंजे थे, तहरीर चौक पर हुए कार्यक्रमों में उसी का साउंडट्रेक बजता था। पैलफ़ेस्ट के स्थानीय आयोजकों से कहा गया था कि कंसर्ट हॉल को दो भागों में बांटें। एक ओर आदमी और दूसरी ओर औरतें। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। हमारे कई लेखक मिस्र से हैं और सत्ताविरोधी जोश पाठ के सत्रों और साक्षात्कारों में ख़ासा बुलंद है। हैरानी की बात नहीं कि हमस को इससे असुविधा होती थी। कुछ भी हो, उस आख़िरी शाम को कस्र अल-बाशा कल्चरल सेंटर के उस छोटे से स्टेज की अचानक बिजली कट जाती है और माइक बंद हो जाता है। कुछ ही देर बाद सादा भेस में एक अधिकारी एक युवा महिला से कैमरा छीनने के लिए दौड़ता है। उसके बाद टकराव शुरू हो जाता है, वहां हथियारबंद पुलिस और सादा वर्दी में सुरक्षा अधिकारियों की बेतुकी भीड़ जमा है। आख़िर में हमें वापस बस की ओर रवाना किया जाता है और होटल जाने दिया जाता है। हम लोग अपने साथ जितना संभव हो सकता है उतने श्रोताओं को ले आते हैं। उनमें से कई संभावित नतीजों से आशंकित है, ख़ासकर हमारे लौट जाने के बाद। सुरक्षा अधिकारियों ने ज़्यादातर लोगों की तस्वीरें खींच ली थी। इधर होटल का टैरेस एक तात्कालिक मंच में बदल दिया जाता है और कंसर्ट रात भर कविता पाठ और गीतों के साथ जारी रहता है।

अगले दिन राफ़ा क्रॉसिंग को जाने वाली सड़क पर, मैं ख़ुद को वो हर चीज़ दर्ज करता हुआ पाता हूं जो मैं बस कि खिड़कियों से देख सकता हूं। एक मकान की चारदीवारी के भीतर चरती भेड़ें, हाथों मे बंदूकें और ओलिव की टहनियां भींचें जंगजुओं के फीके पड़ते म्युरल, तरबूज की तरह रंगी प्लास्टिक की गेंदें, कब्र का एक पुराना तुर्की पत्थर, बार्का कमीज़ें, ऊंट, बमबारी में ध्वस्त हुए पुलों की मरम्मत, मिट्टी के टूटेफूटे बर्तन। जो कुछ भी मैं पिछले चार दिनों मे देख पाया, ये उसे समझने की कोशिश है, उसे कुछ देर अपने पास ही रख लेने की कोशिश। बाद में जब मैं अपनी नोटबुक पर निगाह डालता हूं, चलती हुई गाड़ी के भीतर लिखने की कोशिश में अक्षर हिलते हैं, ऐसा लगता है ये एक पागल शख़्स का कांपता प्रलाप है।

http://www.guernicamag.com/ और जमाल महजूब का आभार।

-शिवप्रसाद जोशी

http://www.samayantar.com/

आधार कार्ड मिलण: साहसिक, रोमांचकारी किस्सा चबोड़्या - चखन्यौर्या: भीष्म कुकरेती

      आधार कार्ड मिलण: साहसिक, रोमांचकारी किस्सा           
                                     
                                       चबोड़्या - चखन्यौर्याभीष्म कुकरेती

गढ़वाली हास्य -व्यंग्य 
सौज सौज मा मजाक मसखरी 
हौंस,चबोड़,चखन्यौ 
                                       
                             आधार कार्ड मिलण: साहसिक, रोमांचकारी किस्सा           
                                     
                                       चबोड़्या - चखन्यौर्याभीष्म कुकरेती
(s = आधी अ )
 
                   जब पैल पैल आधार कार्ड बणनो बात शुरू ह्वे तो मजाक का रूप मा शुरू ह्वे। सब्युन ब्वाल बल नेता लोगुन पैसा खाणों बान एक हैंकि  बुग्याळ की रचना कार। जैदिन राजस्थान मा मनमोहन सिंह जी अर सोनिया जीन आधार कार्ड बांटिन आधार कार्ड की बात मजाक से अफवा मा बदल गे अर  गैस सिलिंडरों दाम  बढ़ण से त अफवा बजार मा उच्छाला ऐ गे। रुस्वड़ बिटेन प्रेस्सर कुकर की सीटी मा, धुंवा माँ   आधार कार्ड का बारा मा अफवाओं की ही छ्वीं लगदी छे। तैबरि तलक हमर परिवार आधार कार्ड तै मजाक कार्ड ही मांणदों छौ।फिर जब जोर की अफवा आइ बल बुजर्गों आधार कार्ड से मोफत मा राशन, इख तलक कि बुड्यों तैं पेन्सन पट्टा बि मीलल तों बगैर आधार कार्ड को रौण असह्य ह्वे गे। मुहल्ला का रस्तों पर लोग दिखाण बिसे गेन,"  ओ फार द्याखो तै मा आधार कार्ड ऐ गे तबि तो छाती बटन खोलि , छाती चौड़ी कौरि जाणों च।" अच्काल जो बि रस्तों माँ रौब से चल्दो तो लोग समजि जांदन कि तैन आधार कार्डो फॉर्म भौरि आल। रासनक दूकान मा जु बि  बिंडी ज़ोर से हल्ला करदो  तो दुकान दार अंदाज लगै दीन्दो कि यु रासन कार्ड धारक ही ना आधार कार्ड धारक बि च।
      
                  हमर बिल्डिंग मा जब बि क्वी परिवार पसीना मा लत पथ , भूक से परेशान पण मुख पर जीत को उत्साह ,आंखों मा मालिकाना घमंड की चमक  खुटोंम कुछ प्राप्ति को रगर्याट,   गेट  भितर आवो तो सब बिल्डिंग वाळ समजि लीन्दन बल स्यु परिवार आधार कार्ड को फॉर्म भौरिक ऐ ग्याइ। वीं रात यु परिवार भैर बिटेन खाणों मंगांद तो जैमा आधार कार्ड भरणो रसीद च वो एकाधिकार खतम हूणों जलन का बशीभूत अर हौरि परिवार हीन  भावना से ओत प्रोत ह्वेका  बरजात जन बगैर छौंक्यां खाणा खांदन।
     हम मरद जो दिन माँ नौकरी करदां वूं तै बिल्डिंग मा अर मुहल्ला मा नयो सामाजिक जाति बणनै खबर रात अपण जनान्युं से चलद। मि तैं अर म्यार नौनु तै ब्वे अर घरवळि  से पता चौल बल अब हम निखालिस पहाड़ी ब्राह्मण नि रै गेवां बल्कणम अब हम निम्न वर्ग  का नागरिक ह्वे गेवां। मुंबई मा हम कथगा इ दै निम्न  श्रेणी नागरिकों श्रेणी मा अवां धौं  -जब हमम रासन कार्ड निछौ, जब हमम दूधो कार्ड नि छौ, जब हमम गैस को कार्ड नि छौ। जब हमम वोटिंग कार्ड नि छौ, जब हमम पासपोर्ट नि छौ तों बगत बगत पर हम बिल्डिंग मा निम्न श्रेणी  गणत मा आवां।               
  आधार कार्ड की रसीद नि होण से हम बीच मा फिर से दलित ह्वे गे छया। मुहल्ला का रस्ता मा हमर परिवार मुंड तौळ कौरिक चलदा छा किलैकि हमम आधार कार्ड फॉर्म भरणो रसीद नि छे।  अब शरम से भैर आणो एकि विकल्प छौ कि हम बि आधार कार्ड बणौवां।
    
                   आधार कार्ड बणानम  सबसे पैलि परेशानी या आयि कि आधार कार्ड का फॉर्म कख मिल्दन? जौंक कार्ड भरे गे छा ऊंमा गेवां तो कैन हम तै अळगसि, नालायक की पदवी दे। कैन डराइ बल आधार कार्ड इन सुदि नि मिल्दन। कैन बथै बल  कि वो तो  कै  नगर सेवकको  पछ्याणक से फॉर्म ल्है छ्याइ   पण  कैन बि नि बताइ कि आधार कार्डो फॉर्म कख मिल्दन। क्वी बि आधार कार्ड होल्डर नि चांदो छौ कि दुसर बि आधार कार्ड का मालिक बौणो।
 हमर मुहल्ला मा एक चणा बिचण वाळ च जो अघोसित पूछ ताछ केंद्र च। वै चणा वाळन पचास रुपया मा बथाइ बल एक म्युनिस्पल स्कूलम फॉर्म मिल्दन। उन वैमा फॉर्म छया जो वो पांच सौ रुपया फी फॉर्म दीणो तयार छौ। पण पांच सौ प्रति फॉर्म हमर बजेट से भैर छौ। हां वैन मै पर इथ्गा मेहरवानी जरूर कार बल जु बथाइ कि फॉर्म लीणों रासन कार्ड जरूर लिजाण।
                 तो मि दुसर दिन  कोलम्बस बौणि  म्युनिस्पल स्कूल खुजणो सुबर सुबर मय रासन कार्ड घर  बिटेन दही -गुड़ खैक ग्यों। मि बीसेक आदिम्युं तै पुछिक कै बि तरां से रिबड़ राबिड़िक  वीं स्कूल पौन्छु। आज पता चौल कि मुंबई मा कोचिंग क्लास , प्राइवेट टयूटरो पता लगाण सरल च पण  म्युनिस्पल स्कूल खुज्याण भौति कठण च। 
        
          स्कूल भीतर  जाण तो कठण छौ किलैकि उख भैर मील तलक तीन लैन लगीँ छे। मीन द्वी तीन आदिमों  तै पूछ बल यी केकि लैन छन तो सब्युंन ब्वाल इनक्वारी से पता लगाओ। अब मीन इनक्वारी क पता पूछ तो पता इ नि चौल कि कख बिटेन इनक्वारी करे जावो। वो तो भलो ह्वाइ जो उपुण एक दलाल घुमणु छौ वेन दस रुपया मा इथगा बथाइ बल इनक्वारी पंगत क्वा च। मि इनक्वारी  लंगत्यार मा खड़ो ह्वे ग्यों। स्याम चार बजि मि इनक्वारी काउन्टर तलक पौन्छु अर वैन बथाइ कि रासन कार्ड दिखाण से फॉर्म मीलल अर फिर फॉर्म मा जो बि लिख्युं च वै हिसाब से कागज पत्र लाओ। उखमि जाण बल  सुबर आठ बजे से नौ बजेक बीच ब्वार अर भुप्यारो (बुधबार अर  गुरु वार ) कुण केवल कुल जमा पांच  सौ फॉर्म ही बंटे जांदन।
           
   जन जन दिन बितणा छया हमारि सामाजिक स्तर /पदवी मा निरंतर गिरावट आणि छे। स्टॉक मार्किट या सट्टा बजारम नुक्सान बर्दास्त ह्वे जांद पण सामजिक स्तर मा गिरावट सबसे जादा असह्य  होंद। ब्वार आण तलक सरा परिवारम बड़ी उक्रांत -उठापोड़ राइ। खैर ब्वार आइ अर मि दही -गुड़ खैक फॉर्म लीणो छै बजी सुबेर म्युनिस्पल स्कूल ग्यों तों पाइ कि लोग द्वी बजे रात से ही लैन लगैक खड़ा छा। खैर मी बि स्कूल से एक मील दूर तक जयीं लैनम लगी ग्यों। उन हम सब्युं तै पूरो भरवस छौ कि आज तो फॉर्म मिलण से राइ पण क्वि बि रणछोड़ दास बणनों तयार नि छौ अर सबि क्वीनम लग्युं गुड़ चाटणो जन कोशिस मा लैनम खड़ा रौंवां। सवा आठ से पंगत अगनै  सरकण लगि तो हम आस्तिक ह्वेका भगवान पर विश्वास करण मिसे गेवां।  पण ठीक  नौ बजे हल्ला से जाण बल  फॉर्म खतम ह्वे गेन , हमर भगवान पर  विश्वास खतम ह्वे ग्याइ अर हम सौब फिर से नास्तिक ह्वे गेवां।   
    भुप्यार रात मि  चटै, पाणि बोतल  अर द्वी परोठा लेक स्कूल औं तो उख पैलि लोग लैन मा चटै लेक पोड्या छया। कुछ जो अग्वाड़ि दस बजे ही ऐ गे छया वो से गे छ्या। मीन बि लैन मा चटै बिछै अर पोडि ग्यों।  कार्डन वर्ग अंतर खतम करी दे छौ। सबि वर्गों लोग लैन मा पोड्या छा। जौमां टैबलेट , आइ पैड या स्मार्ट फोन छौ वो  व्यस्त छया।
    सुबेर तलक कथगा इ दै ऊंग आयि नींद खुल कि क्वी पैथरौ में से  अगनै नि ई जावो। अदनिंद  मा बार बार आधार कार्डो सुपिन आंदो छौ अर कार्ड नि मिलणो सुपिन आंदो छौ तो मि  बर्र करिक  बिजि जांदो छौ अर हरेक इनि बार बार बर्र बर्र करिक बिजणा छा। सैत च जौंकि पियिं छे वूंकि नींद नि बिजणि छे। सुबेर सबि कोशिस मा लग्यां छा कि झाड़ा पिसाब रोके जावो। स्कूलम भैराक लोग झाड़ा पिसाब नि करी सकदा छा तो लोग अपण अग्वाड़ी -पैथर का आदिम से मिन्नत अर आज्ञा लेकि दूर  कखि झाड़ा पिसाब करी आणा छा। मीन झाड़ा त रोकि दे पण पिसाब पर मेरो बस नि चौल अर  मि  अपण ऐथर पैथर वाळु  से आज्ञा लेकि पेशाब्  कौरि औं। अफवा गरम  छे कि आज बस तीन सौ फौरम बंटल तो इन बि अफवा उड़ कि आज फौर्मुंन नि बंट्याण। कुछ लोग बस मुंह जवानी लड़णा छ्याइ। समय छौ कि अग्वाड़ी नि बढ़णो छौ अर पैथर लाइन छे कि कम नि होणि छे, बढ़दि जाणि छे।              
 खैर कै बि तरां सवा आठ बजे हलचल शुरू ह्वे अर फॉर्म बंट्याण शुरू ह्वेन। उचमुचि, उक्रांत, प्रतीक्षा से मन विचलित छौ अर कखि आज फॉर्म नि मिलल को नकारात्मक अंदेसा से ब्लड प्रेशर कम हूणु छौ , शरीर सुन्न होणु छौ। खैर मि मंथर चाल से खिड़कीम पौंछि ग्यों अर भगवान  अशीम अनुकम्पा से मि आधार कार्डक फॉर्म मिलि गेन। खुसी ? इंदिरा गांधी तै बंगलादेशऐ लड़ाई  जितणो उथगा  खुसी नि ह्वे होलि जथगा खुसि मैं तैं आधार कार्ड क फॉर्म मिलण पर ह्वै।    
          जनि मि फॉर्म लेक बिल्डिंग मा औं कि कुछ लोगुं तै भनक लगि गे कि मि आधार कार्डो फॉर्म लीणों जयुं छौ तो कुछ लोग मै पर रूसे क्या भड़कि गेन कि मीन ऊं तैं किलै नि भट्याइ। मीन त ना पर ब्वैन ऊं तैं याद दिलाइ कि ऊंन बि वोटर कार्ड या वरिष्ठ नागरिक कार्ड बणान्द दै  हम तैं नि भटे छौ।  
   अब बिल्डिंग मा हम सरयूळ बामण त ना पण पुड़क्या बामणु पदवी पर ऐ गे छया। ब्वैन ब्वाल बल हम अब मुहल्ला मा मुख दिखाण लैक ह्वे गेवां।
पैल हमन फौर्मुं फोटोकॉपी बणाइ।बड़ी तरकीब, धैर्य  से हमन फोटोकापी को फॉर्म भौर फिर हमन एकैक करीक असली फॉर्म भौर। जब सौब फॉर्म भरे गेन  तो मि स्कूल ग्यों अर मीन दलाल तै बीस रुपया देकि पता लगाइ कि कु दिन फौरम जमा करणों च।
 फिर मि चटै, पाणि बोतल अर परोठा लेक द्वी बजि रात स्कूलम ग्यों। रात भर उखि पड्यु रौं। सुबेर मेरि जगा लीणों म्यार बडों नौनु आइ। मि घौर औं। फिर नौ बजे हम सबि परिवार वळा  अपण जगा मा गेवां। तीन बजि हमर नम्बर आइ। उन तो सब काम लाइन से हूणु छौ पण बीच बीच मा भारतीय संस्कृति का दर्शन बि हूणु छौ याने जौन इकै हजार फॉर्म पर अतिरिक्त सेवा कर दे वो बगैर लाइन का ही भितर जाणा छया।
भितर कम्प्यूटर मा हमन हेरकान ठीक से जांच कार कि सूचना ठीक से भरीं च कि ना। फिर म्यार हथों छाप कम्प्यूटर पर  लिए गे अर आखिरैं अंगूठा का छाप लिए गे।
 आखिर हम तै एकै रसीद मील कि हमन सरकारी स्तर पर आधार कार्ड भोरि आल।
  जब हम स्कूल से  आधार कार्ड भरणो  रसीद  लेकि भैर अवां तो हम तै लग बल हमन जग जीती आल।
बिल्डिंग मा जौं जौं मा आधार  कार्डो रसीद छे ऊंन हम तै वधाई दे अर 'आधार कार्ड इन पेंडिंग क्लब' माँ शामिल कार अर मीन ऊं तैं खुसी मा दारु पार्टी द्यायि तो ब्वैन अर घरवळिन जनान्युं तै केक पार्टी दे अर बच्चों मा चौकलेट बांटे गे।            
  
Copyright @ Bhishma Kukreti   1/4/2013 

'आंबेडकरी समाज व आंबेडकरवादी समाज' या दोन्ही संज्ञा एकाच आहेत की, त्यामध्ये काही फरक आहे?

'आंबेडकरी समाज व आंबेडकरवादी समाज' या दोन्ही संज्ञा एकाच आहेत की, त्यामध्ये काही फरक आहे?


'आंबेडकरी समाज व आंबेडकरवादी समाज' या दोन्ही संज्ञा एकाच आहेत की, त्यामध्ये काही फरक आहे? आणि तो फरक जुजबी आहे कि नेम्केपानातून आहे? हे जाणून घेवू या. आंबेडकर हे नाम तर आंबेडकरवाद हे गुणविशेषण ठरून त्या नुसार वाद हा शब्द 'विचार' या अर्थाने अंतर्भूत आहे. मात्र तशी स्थिती आंबेडकरी या शब्दाची नाही.'श्रमकरी/कष्टकरी' कष्ट करणारा, 'गावकरी' म्हणजे विशिष्ट गावातील रहिवासी. त्या अर्थाने 'आंबेडकरी'म्हणजे कोण? तर आंबेडकरांच्या जाती जातीचा. फार तर ओढून ताणून त्यात अनु. जातीच्या सूचीमधील अन्य काही जातीच्या लोकांचा समावेश केला जावू शेकेल. मात्र त्यापलीकडे त्याची व्याप्त विस्तारता येत नाही.'आंबेडकरी' म्हणजे आंबेडकरांच्या धर्माचा असाही अर्थ घेत येत नाही; कारण पूर्वीचे महार (अतिसुद्र) जे नंतर बौद्ध झाले असा त्याचा अर्थ निघतो. उपरोक्त विवेचन लक्षात घेता, आंबेडकर शब्दाला लावलेल्या 'ई' या प्रत्यायामुळे आंबेडकरी म्हणजे आंबेडकरांच्या समाजचे अथवा जातीचे याहून वेगळा अर्थ घेत येत नाही. भारतात समाज म्हणजे 'जात-समाज' अशी रूढ संकल्पना आहे. त्यामुळे कुणबी समाज, तेली समाज, माळी समाज, अशा समाज संघटना अस्तित्वात आहेत. त्यानुसार आंबेडकरांचा समाज म्हणजे आंबेडकरांना अभिप्रेत समाज असाही अर्थ त्यातून काढता येत नाही. म्हणूनच 'आंबेडकरी समाज' व 'आंबेडकरी चळवळ' हि संबोधने म्हणजे महारी चळवळ अथवा दलित चळवळ असा त्याचा अर्थ होतो. हेच प्रचारित करण्यासाठी शेत्रुने आणूनबुजून 'आंबेडकरी' हा शब्द मोठ्या प्रमाणावर धृतपणे प्रसारित केला. आम्ही मात्र त्या शब्दाचा मुक्त वापर व्यापकतेच्या भावनेतून अज्ञान्वाश करीत होतो. परंतु त्या शब्दाचे मर्म काय? आणि त्या शब्दाला मैदानात उतरविनारयाची खेळी कोणती? या अनुषंगाने कधीच विचार केला नाही. मार्क्स च्या विचाराशी प्रतीबधता सांगणाऱ्याना जर मार्क्सकरी म्हणून संबोधित नाही; त्याच प्रमाणे गांधीशी संबधित वैचारिक प्रतीबधता बाळगणारयाना गांधीकरी म्हणत नाही तर मग आंबेडकरांशी वैचारिक प्रतीबधता सांगणारे 'आंबेडकरी' कसे? हा प्रश्न कधी आमच्या मनाला शिवला नाही. क्रमश. संदर्भ, आंबेडकरी आणि आंबेडकरवादी p ३०

मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित संजय कुमार की पुस्तक ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ का लोकार्पण

मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित

संजय कुमार की पुस्तक 'मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे' का 

लोकार्पण


15 hours ago 

मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित
संजय कुमार की पुस्तक 'मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे' का लोकार्पण

लखनऊ, 31 मार्च। मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित है। साथ ही वे अगर मीडिया में आ भी जाये तो करेंगे क्या? एक बड़ा सवाल मौजूद है, जिस पर समग्र रूप से विचार करने की जरूरत है। मुख्य धारा की मीडिया को जनतांत्रिक कैसे बनाया जाये इस पर भी विमर्श की आवश्यकता है। आज यू. पी पे्रस क्लब लखनउ में लेखक व पत्रकार संजय कुमार की किताब 'मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे' के लोकार्पण के बाद वक्ताओं ने परिसंवाद में यह बातें कही। पुस्तक का लोकार्पण संयुक्त रूप से मानवाधिकार कार्यकर्ता व दलित चिंतक एस आर दारापुरी, जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव, प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, दलित चिंतक अरूण खोटे और जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया। 
प्रिसंवाद के दौरान जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि मीडिया में मुकम्मल भारत की तस्वीर नही हैं, गांव नहीं है, हाशिये का समाज नहीं है। मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित है। आज समाज को समग्र नजरिये से देखने की जरूरत है। उपस्थिति के साथ, दलित समाज के आलोचना की जरूरत के लिए भी मीडिया में दलितों की आवश्यकता हैै। 
वहीं दलित चिंतक अरूण खोटे ने कहा कि इतिहास में जायंे तो दलित ही मीडिया के जनक रहे है। इसके बावजूद शिक्षा और संसाधनों से वंचित यह वर्ग अब मीडिया से गायब हो गया है। आज बात सिर्फ मीडिय में दलितों के प्रतिनिधित्व नहीं है, बल्कि दलितों के मुद्दों के लिए क्या यहंा जगह है-सवाल यह भी है।
दलित चिंतक एस आर दारापुरी ने कहा कि दलितों के साथ अब भी भेदभाव बरकरार है। लेकिन यह सब मीडिया में खबर नहीं बनती है, क्योंकि मीडिया भी उसी द्विज वर्चस्व को बरकरार रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि मीडिया में दलित नहीं है यह सच्चाई है तो सवाल यह है कि हम क्या करें। ऐसे में दलित मीडिया को आगे लाने की जरुरत है। दूसरी ओर महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि राजनीति को समझते हुए दलितों और मुस्लमानों को एक साथ आगे आना होगा और लामबंद तरीके से लड़ाई लड़नी होगी। जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि कहने को तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन समाजिक बराबरी आज भी दुर्लभ है। मीडिया को लोकतंत्र का चैथा खंभा कहा जाता है परन्तु इसकी बनावट जातिवादी तथा दलित विरोधी है। दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाशाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेश भी पा लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढंूढ़े जाते हैं। 
पुस्तक के लेखक और आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक संजय कुमार ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का चैथा खंभा कहा जाता है परन्तु इसकी बनावट जातिवादी तथा दलित विरोधी है। दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाशाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेश भी पा लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढंूढ़े जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया के सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि मीडिया में दलित ढूंढते रह जायगे। सर्वे के अनुसार कुल जनसंख्या में 8 प्रतिशत वाली ऊँची जातियों का मीडिया हाऊस में 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर कब्जा है। इनमें 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, वैश्य और राजपूत 7-7 प्रतिशत, खत्री-9, गैर द्विज उच्च जाति-2 और अन्य पिछड़ी जाति 4 प्रतिशत हैं। इनमें दलित कहीं नहीं दिखते। श्री कुमार ने कहा कि राजनैतिक रूप से जागरूक बिहार की राजधानी पटना के मीडिया घरानों में काम करने वालों के भी सर्वे है। सर्वे के मुताकिब बिहार के मीडिया में सवर्णों का 87 प्रतिशत कब्जा है। इनमें ब्राह्मण 34, राजपूत-23, भूमिहार-14 और कायस्थ-16 प्रतिशत है। शेष 13 प्रतिशत में पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और दलितों की हिस्सेदारी है। इनमें सबसे कम लगभग 01 प्रतिशत दलित पत्रकार ही बिहार की मीडिया से जुड़े हैं। सरकारी मीडिया में लगभग 12 प्रतिशत दलित है। जसम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में नाटककार राजेश कुमार, अलग दुनिया के के.के.वत्स, कवि आलोचक चंद्रेश्वर सहित कई चर्चित पत्रकार-साहित्यकार उपस्थित थे। 
विषय पर परिसंवाद का आयोजन जन संस्कृति मंच ने यू0 पी0 प्रेस क्लब में किया गया।
कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर किया।


कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मो - 8400208031, 9807519227
 — with Kaushal Kishor,Tahira HasanYogesh NafriaMediamorcha E-patrika MediamorchaJayprakash ManasDalit Mat and Musafir D. Baitha.
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