THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA INDIA AGAINST ITS OWN INDIGENOUS PEOPLES

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Friday, August 2, 2013

Rajiv Nayan Bahuguna मेरे संपादक और संतापक ---२ ----------------------------------- आजन्म भद्र , आमरण भद्र , माथुर बाबा

मेरे संपादक और संतापक ---२
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आजन्म भद्र , आमरण भद्र , माथुर बाबा 

श्याम सुंदर आचार्य के प्रकोष्ठ से निकल कर मैंने दफ्तर के नीचे थडी पर चाय पी , और फिर राजस्थान विश्व विद्यालय की ओर चल पड़ा , जहाँ से मेरी कई विगतस्मृतियाँ जुडी थीं , और जहाँ से मुझे हॉस्टल की मेस का बिल समय पर न देने के कारण फिर से दिल्ली का रुख करना पड़ा था . यहाँ( दिल्ली में ) नव भारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर मेरे पिता के पुराने मित्र और परिचित थे . इस बार मैंने उन्हें कहा कि मै रिसर्च का काम छोड कर दिल्ली ही चला आया हूँ , और अब पूरी तरह से उनके सुपुर्द हूँ . तेजस्वी , भद्र , आत्म विश्वासी और उत्साही तथा भावुक राजेन्द्र माथुर स्वयं को एक आधुनिक व्यक्ति समझते थे , शायद हों भी . लेकिन परम्पराओं का आदर्शवाद उनमे हठात छलक -छलक जाता था . वह बोले - मेरे लिए इतना ही यथेष्ठ है कि तुम सुंदर लाल बहुगुणा के आत्मज हो , लेकिन यदि तुम पत्रकारिता के योग्य साबित न हुए तो मै तुम्हे कहीं हिन्दी का प्राध्यापक बना दूँगा . वैसे वह मुझे तथा हर छोटे बड़े को आप कह कर ही संबोधित करते थे . मैंने हामी भरी . उन्होंने मुझे न्यूज़ एडिटर हरीश अग्रवाल के सुपुर्द किया , और हरीश अग्रवाल ने यू. पी डेस्क के इंचार्ज अरुण दीक्षित के . यहाँ बैठ कर मै कापी एडिटिंग , हेडिंग लगाना , इंट्रो बनाना तथा कापी पुनर्लेखन काम सीखने लगा . सब कुछ तो ठीक था , पर जब कभी अंग्रेजी का तार मुझे आनुवाद को दिया जाता तो मेरे फ़रिश्ते कूच कर जाते . पहाड़ के टाट पट्टी वाले स्कूलों में हमने अंग्रेजी उन गुरुओं से सीखी थी , जो अंग्रेज़ी भी गढवाली भाषा में पढ़ाते थे . उकता कर मै बार - बार माथुर साहब के पास अपनी विनय पत्रिका लेकर जाता , तो उनका दो टूक जवाब यही होता कि किसी नए संस्करण के लिए जब परीक्षा होगी , तो मुझे वह क्वाली फाई करनी होगी . नियुक्ति का इसके सिवा कोई भी उपक्रम नही है . मै उनसे हर मुलाक़ात के बाद घोर निराशा से भर उठता , क्योकि नव भारत टाइम्स की पत्रकार परीक्षा में उस समय अंग्रेज़ी का एक कठोर पर्चा होता था , और मुझे अंग्रेज़ी उतनी ही आती थी , जितनी सोनिया गांधी को हिन्दी आती है . लेकिन मुझे क्या पता था कि नव भारत टाइम्स में सीनियर पदों पर काम कर रहे हमारे उत्तराखंडी वरिष्ठ मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नक़ल करवा कर पास करवा देंगे .
( जारी रहेगा मित्रों , सुझाव अवश्य दें )

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