THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA INDIA AGAINST ITS OWN INDIGENOUS PEOPLES

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Thursday, October 30, 2014

वीरेनदा से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल जिंदगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारुदी सुरंग भी है।

वीरेनदा से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल जिंदगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारुदी सुरंग भी है।



पलाश विश्वास


सवा बजे रात को आज मेरी नींद खुल गयी है।गोलू की भी नींद खुली देख,उसकी पीसी आन करवा ली और फिर अपनी रामकहानी चालू।


जो मित्र अमित्र राहत की सांसें ले रहे थे,नींद में खलल पड़ने से बचने के ख्याल से बचने के लिए,उनकी मुसीबत फिर शुरु होने वाली है अगर मैं सही सलामत कोलकाता पहुंच गया तो,यानि आज से फिर आनलाइन हूं।


कल सुबह आठ बजे निकला था और नोएडा सेक्टर बारह, इंदिरापुरम,कलाविहार मयूरविहार होकर प्रगति विहार हास्टल रात के नौ बजे करीब लौटा।


आनंद स्वरुप वर्मा के वहां गहन विचार विमर्श,वीरेनदा से गहराई तक मुलाकात और पंकज बिष्ट के साथ उनके घर में बिताये कुछ अनमोल अंतरंग क्षणों के साथ दिल्ली की यह यात्री इसबार बहुत अनोखी बन निकली है और थकान से चूर चूर होकर दस बजे ही घोड़े बेचकर सो गया था लेकिन दिमाग के सेल दुरुस्त होते ही आंखें फिर उनींदी हैं।


अपने राजीव कुमार तो दिल्ली में आकर सन्नाटा जी रहे हैं बाकी गपशप तो गोलू,पृथू और मीना भाभी के साथ हो रही है और लग रहा है कि राजीव नये सिरे से कुछ बनाने की सोच रहा होगा।


इसबर वीणा और अरुण को खूब शिकायतें होंगी और अपने परिवार के बच्चों को भी कि मैं इस बारक सिर्फ दोस्तों से मिला हूं,परिजनों से नहीं।


मयूर विहार गया लेकिन झिलमिल नहीं गया वीणा के घर और नजहांगीर पुरी गया,जहां अरुण के बच्चे कृष्णा और तरुण को शायद अपने ताउ और ताई का इंतजार रहा है।


उनसे हम लोग मार्च तक मिलेंगे जरुर।नई दिल्ली के सीमेंट के जंगल में नहीं,अपने घर बसंतीपुर में।इसी उम्मीद के साथ आज दुरंतोे से कोलकाता लौट रहा हूं।


गनीमत है कि कोलकाता के बड़ाबाजार में धूल और ट्राफिक जाम में फंसे 14 अक्तूबर को सविता की तबियत इतनी खराब भी नहीं हुई और बसंतीपुर से होकर नैनीताल, देहरादून, बिजनौर होकर दिल्ली तक दौड़ दौड़कर कल रात बुलेटदौड़ से हम थक कर कब सो गये,पता ही नहीं चला और अबकी यात्रा की किस्त पूरी हो गयी और सविता मेरे साथ लगातार दौड़ती रहीं।उनका भी आभार।


पता नहीं कि ऐसी रात फिर कभी नसीब होगी या नहीं।


दिल्ली में अब भी एक बेचैन कवि आत्मा जिंदगी जीने का हुनर सिखा रही हैं हमें।


उन्हीं के साथ आज की सी कोई पूस की रात को नैनी झील के किनारे हम लोगों ने कड़कड़ाती सर्दी में आखिरीबार उधम मचाया था और उस कवि ने कहा था कि पलाश,तुम सिर्फ गद्य लिख सकते हो,कविता हरगिज नहीं लिख सकते और तब मैंने कहा था कि दा,जरुर लिख सकता हूं।


उस रात हमारे साथ एक और कवि थे पहाड़ और तराई में दिवानगी की हदतक काव्यधारा में बहनेवाले ,हमारे वजूद का हिस्सा जो अब भी बने हुए हैं,हमारे गिरदा।


साथ थे,राजीव लोचन साह जैसे नख से शिख तक भद्रपुरुष और वैकल्पिक मीडिया की लड़ाई शुरु करने वाले हमारे सुप्रीम सिपाहसालार आनंदस्वरुप वर्मा भी।


शमशेर सिंह बिष्ट भी शायद आधी रात बाद बीच झील की तन्हा नैनीताल की उस रात के गवाह रहे हैं।शायद शेखर पाठक भी थे और हरुआ दाढ़ी भी।ठीक से याद नहीं है।


जाहिर है कि वह रात अब कभी नहीं लौटेगी,गिरदा के बिना वह रात लौटेगी नहीं।आनंद स्वरुप वर्मा ने कहा भी कि गिरदा के बिना नैनीताल सूना अलूना है और अब वहां जाना सुहाता नहीं है।पहाड़ों में गिरदा का न होना हमारे यकीन के दायरे से बाहर है।


आज की इस रात की सुबह तो यकीनन होगी ही और सुबह की न सही,शाम की गाड़ी से उस कोलकाता जरुर पहुंचकर फिर धुनि रमानी है,जहां इन्हीं कवि आत्मीय अग्रज ने मुझे सन 1991 को जबरन भेज दिया था कि कोलकाता को बदले बिना दुनिया नहीं बदलेगी और तबसे मैं कोलकाता को बदलने में लगा हूं ।


क्योंकि कवि हूं नहीं मैं फिरभी,एक अति प्रिय कविमित्र बड़े भाई के जुनूनी यकीन को सच में बदलने का जिम्मा मुझपर है कि दुनिया के गोलाकार वजूद की पूंछ वहीं से पकड़कर उस ऐसी पटखनी दूं कि सारी कविताएं सच हो जायें एकमुश्त।


मुझे कविताओं में रमने का मौका नहीं मिला तो क्या हमारे वीरेनदा और हमारे गिरदा कवि बतौर याद किये जाएंगे और देशभर के कवियों से लगातार मेरा दोस्ताना और दुश्मनी का रिश्ता जीने का मौका भी लगता है।


बाकी तोे बिजनौर के पास सविता के मायके गांव धर्मनगरी में एक युवा अति कुशाग्र बुद्धि के बीटेक इंजीनियर तापस पाल की राय में हमारी पीढ़ी के लोग कुल मिलाकर घंटा हैं। उससे मुठभेड़ के बारे में बाद में फिर।


इंदिरापुरम में जयपुरिया सनराइज शायद उस बहुमंजिली इमारत का नाम है,जिसमें हमारे समय के सबसे शानदार ,सबसे जानदार कवि का बसेरा है इसवक्त। आठवीं मंजिल में।जहां आनंदजी के वहां से हम लेट पहुंचे और वीरेनदा इंतजार में थके भी नहीं।परिवार में सिर्फ रीता भाभी से मुलाकात हो पायी।वे जस की तस हैं साबुत।लेकिन बच्चों से इस दफा मुलाकात हुई नहीं है।


कम से कम वीरेनदा से मिलने फिर इस शहर को आउंगा,जिसे मैं कभी प्यार नहीं कर सका क्योंकि वह लगातार लगातार जनपदों को चबाता जा रहा है और सारी सत्ता यहीं केंद्रित हैं और सारी साजिशें जनता के खिलाफ यही से शुरु होती हैं।


मन ही मन मैं शायद मणिपुरी हूं या तामिल या बस्तर दंतेवाड़ा का कोई सलवा जुड़ुम दागा आदिवासी क्योंमकि मैं जख्मी हिमालय भी हूं।


अबकी बार वीरेनदा से मिलकर लगा कि कविता दरअसल लिखने की कोई चीज होती नहीं है,कविता जीने की चीज होती है और कवि जबतक कविता में जीता है,तब तक जिंदगी बची होती है और तभी तक बनती बिगड़ती रहती है दुनिया।


कविता के बिना न सभ्यता होती है और न मनुष्यता।


यह सिरे से संवेदनाओं का ही नहीं,सरोकार का मामला है।


संवेदनाओं और सरोकार में जीनेवाली कविता की मौत होती नहीं है उसीतरह जैसे दुनिया को बदलने वाली जब्जे की मौत होती नहीं है।


और बदलाव की फल्गुधारा कविता की ही तरह हमारी रगों में बहती रहती है।


और हजारों रक्तनदियों की धार उसकी दिशा नहीं बदल सकती है।


न उसकी मंजिल कभी बदल सकती है भले भटक जाये या बदल जाये हमारे दिलोदिमाग, हमारे सरोकार लखटकिया करोड़पतिया कारोबार में।


सोलह मई के बाद की कविता के अन्यतम आयोजक रंजीत जी,अपने युवा भविष्य अभिषेक और अमलेंदु दोनों आज दिनभर हमारे साथ रहे जो आनंदस्वरुप वर्मा, वीरेनदा और हमारे सान्निध्य में अब तक हमारा कियाधरा को जारी रखनेवाले सबसे काबिल लोग हैं ।


अभिषेक,अमलेंदु,रियाज,सुबीर गोस्वामी,पद्दो लोचन,एकेसकैलिबर,शरदिंदु और आनेवाली पीढ़ियों के सहारे और उन तमाम युवा दिलोदिमाग जो आज की युवा स्त्रियों के खाते में भी हैं,हम छोड़ जायेंगे एक बेहतर दुनिया, साबूत सकुशल पृथ्वी,इसी तमन्ना में अटकी है हमारी जान जहां।


युगमंच का सिसिला अभी जारी है।


नैनीताल समाचार निकल रहा है।

समकालीन तीसरी दुनिया को बेहतर बनाने की तैयारी है और राजतंत्र फिर वापस नहीं लौटेगा और न फासीवाद मनुष्यता और सभ्यता का नाश कर सकता है।


पंकज दा हमें मयूर बिहार एक्सटेंशन तक पैदल छोड़कर फिर समयांतर के ताजा अंक को तराशने में लगे हैं,इससे बेहतर तस्वीरें हमारे लिए दूसरी हैं ही नहीं और न हो सकती हैं।


जैसे कि कविताएं सोलह मई के बाद अबी भी लिखी जा रही है चाहे गंगा के घाट बदले हों,पहाड़ में लालटेन जलती न हो और न कोई पौधा बंदूूक बन पाया हो और न कविता ने शहरों की घेराबंदी की हो।ये तस्वीरें बदलाव के यकीन को मजबूत बनाती हैं।


जिनके साथ पीढ़ियां भी कई हैं उतने ही प्रतिबद्ध,जितनी हमारी पीढ़ियां रही हैं और मकबरों के इस शहर से शायद जीने का शउर सिखाने वाले एक कवि की कविता में बेहद कैजुअल,आलसी कस्बाई जनपदीय जिंदगी रुप रस गंध के लोक में जीने की तमीज और कैंसर को हराने वाली कविता की औकात से मुखातिब होकर अब हमको पूरा यकीन है कि हम रहे न रहें,बची रहेगी जिंदगी फिर भी और हमेशा कि तरह बदलती रहेगी यह हमारी पृथ्वी भी।


जिसे गोलक बनाकर खेल रहे हैं दुनियाभर के आदमखोर लोग।


फिरभी यकीन है कि प्रकृति पर्यावरण,मनुष्यता,सभ्यता और लोक में बसे भिन भिन भाषा,अस्मिता और पहचान के लोग न उन्हें,उन आदमखोरों और मानवताविरोधी युद्धअपराधियों को  बख्शेंगे और न इस दुनिया को खत्म करने की कोई इजाजत देंगे।


यह तंत्र मंत्र यंत्र का तिलिस्म हम न तोड़ सकें तो क्या,नईकी फौजें आवल वानी और जइसा कि अपन गोरखवा कभी कहिलन,सच होइबे करें।


इस उपमहादेश में सर्वत्र आतंक के खिलाफ अमेरकिका के युद्ध के खिलाफ कोई शहबाग आंदोलन भी है और यादवपुर के छात्र अब भी सड़कों पर हैं और बाकी छात्र युवा भी कभी भी सड़कों पर उतर सकते हैं।


जैसे फिर कभी न कभी सड़कों पर उतर सकता है समूचा मेहनतकश तबका इस अबाध पूंजी के मुक्तबाजार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध में।


कविता में आस्था यही सिद्ध करती है।

कविता धर्मांध राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति तो हरगिज नहीं हो सकती।

हर कविता की शक्ल वाल्तेअर जरुर है जिस के लिए मौत की सजा तय है।


सच वह भी अंतिम नहीं है जो तुलसी दास जी कहल वानी कि होइहिं सोई जो राम रचि राखा।राम जो रचि राखा,उसी को पलटने वाले कवि रहे हैं तमाम अगिनखोर।


बाकी दुनिया की तमाम कविताएं दरअसल बदलाव की नीयत की कविताएं हैं, जिनमें जीते जीते गोरख ऊबकर चल दिये,पाश आतंकवादियों के हाथों मारे गये,नवारुणदा कैंसर से जूझते जूझते चल दिये और पहाड़ों को हुड़के से जगाते रहे हमारे गिरदा और दिल्ली के मकबरों के बीच मुकम्मल जिंदगी का शापिंग माल हाईराइज खोल बैठे हैं हमारे वीरेनदा।


हमारे लिए कोई कवि महान नहीं होता।


हमारे लिए  कोई कवि अच्छा या बुरा नहीं होता।


नाम देखकर दाम तय करते हैं सौदागर मानुख और हम यकीनन सौदागर जमात के नहीं हैं।कविता लिख सकूं हूं या नहीं,हूं उसी गोरख,गिर्दा, पाश,नवारुण,चे,मायाकोवस्की वगैरह वगैरह के गोत्र का ही हूं और मेरे खून में भी डीएनए वहीं मूलनिवासी।


जिनके लिए कविता सौंदर्यबोध और व्याकरण नहीं है,न निहायत ध्वनियों का सिनेमाघर है,न भाषायी करतबी चमत्कार है,न जादुई यथार्थ है,न बंधी बंधायी कोई कैद गंगा है पवित्रतम सड़ांध।


बल्कि जिनके लिए  एक मुकम्मल जिंदगी है और दुनिया को उसकी धुरी पर चलते देने का गुरिल्ला युद्ध है निरंतर।


हम हर कविता में जनता का मोर्चा खोजते हैं।


हम हर कविता में जनसुनवाई खोजते हैं।


हम हर कविता में मुक्त बयार,उत्तुंग शिखर,अनबंधी नदियां और खिलते हुए बारुद के की देह में माटी की खुशबू के साथ एक मुकम्मल गुरिल्ला युद्ध प्रकृति पर्यावरण मनुष्यता और सभ्यता के हक में चाहते हैं।


ऐसी हर कविता के कवि हमारे वजूद में शामिल होते हैं और चाहे कविता वह रचे न रचे,असली कवि वही होता है जो माटी से गढ़ सके वह मुक्म्मल दुनिया रोज रोज,जिसे रोज रोज परमाणु विध्वंस के मुक्तबाजारी हीरक  चतुर्भुज के विकास सूत्र में तबाह करने लगे हैं तमाम रंग बिरंगे अमानुष युद्ध अपराधी और जो मनुष्यों की दुनिया को ग्लोब बनाकर अपनी ही शक्लोसूरत वाली क्लोन रोबोट रिमोट नियंत्रित डिजिटल पुतलियों की नई सभ्यता रच रहे हैं।


हम हर पल सोलह मई के बाद की कविता में वह कविता खोज रहे हैं जिसे हमारे तमाम प्रियकवि रचते रहे हैं और जिसे पाश नवारुण गिरदा सुकांत चेराबंडुराजू और गोरख आखिरी सांस तक जीते रहे हैं और जिसे जीते हुए हम सबसे ज्यादा जिंदा हैं अब भी हमारे वीरेनदा।


हमारे हिसाब से हर कवि को कवि चाहे हो या न हो वह,कविता चाहे वह रचे न रचे,आखिरी सांस तक चेराबंडू,पाश, गिरदा और वीरेनदा की तरह दुनिया को बदल देने के इरादे के साथ एक मुकम्मल इंसान भी होना चाहिए।


हमारे हिसाब से कवि होंगे बहुत सारे श्रेष्ठ,शास्त्रीय और कालातीत महान,लेकिन जिंदगी में कविता जीने वाले कवि कोई कोई होते हैंं और खुशकिस्मत हैं हम कि वे सारे कवि हमारे ही वजूद में शामिल हैं।



वीरेनदा से मिलकर इस रात के बीतने के बेचैन इंतजार को जी रहा हूं फिलहाल और कहने की जरुरत नहीं कि इसबार दिल्ली आना बेहद अच्छा लग रहा है।



वीरेनदा से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल जिंदगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारुदी सुरंग भी है।


Wednesday, October 29, 2014

गोमुख में रेगिस्तान देखा तो सुंदरलाल बहुगुणा ने चावल खाना छोड़ दिया कि एशिया में चावल अब होंगे नहीं।

गोमुख में रेगिस्तान देखा तो सुंदरलाल बहुगुणा ने चावल खाना छोड़ दिया कि एशिया में चावल अब होंगे नहीं।

जमीन जल जंगल बेचकर करोड़पति बने लोगों के वर्चस्व तले दबे पहाड़ हैं तो आपराधिक राजनीति और निरंकुश बाजार के चंगुल में तेजी से नगर महानगर में बदलते हुए जख्मी लहूलुहान गांवों में हरे अनाकोंडा का डेरा है,पता नहीं कब किसे निगल जायेे।

पलाश विश्वास

गोमुख में रेगिस्तान देखा तो सुंदरलाल बहुगुणा ने चावल खाना छोड़ दिया कि एशिया में चावल अब होंगे नहीं।


वे वयोवृद्ध हैं और घटनाक्रम को हूबहू याद नहीं कर सकते।वे लेकिन हमारे मुद्दों को भूले नहीं हैं।पैंतीस साल बाद उन्होंन हमें पहली नजर से पहचान लिया और सारे नारके उन्हें याद हैं।


हम उन परिणामों को खंगालने में अभ्यस्त और दक्ष हैं,जिन्हें हम बदल नहीं सकते।हम उन कारणों और मुद्दों को संबोधित करने के मिजाज में कभी नहीं होते,जिन्हें हम अइपना कर्मफल बताते अघाते नहीं हैं।ङम वे आस्थावान धार्मिक लोग हैं ,अधर्म और अनास्था जिनका जन्मसिद्ध अधिकार है।


दिवाली के बाद आज पहलीबार आनलाइन होने का मौका मिला है।


पहलीबार अपने गांव में,अपने जनपद में और अपने राज्य में मुझे खुद  को अवांछित अजनबी जैसा महसूस हुआ।


पहलीबार मैं अपने कस्बों में एक सिरे से दूसरे सिरे तक खोजता रहा अपनों को ,कहीं कोई मिला ही नहीं।


जो मिला वह हमें हमारी क्रयशक्ति से तौलने में लगा रहा।ऩ अपनापा और न कोई सम्मान।


पहलीबार मुझे अपने पिता कूी मूर्ति से खून चूंती  नजर आयी और पहलीबार मुझे लगा कि इस सीमेंट के जंगल में मेरे पिता समेत हमारे किसी भी पुरखे के लिए कोई जगह नहीं है।


पहलीबार मुझे लगा कि मेरे पिता को भी एटीएम बना दिया गया है और उनके नाम से करोड़पति बन रहे लोगों की जनविरोधी हरकतों के मुकाबले मेरे पास कोई हथियार नहीं है।


पहलीबार लगा कि गौरादेवी और सुंदरलाल बहुगुणा के चिपको की आड़ में लोगों ने अपने अपने घर भर लिए और बेच दी तराई,नदियां बेच दीं,बेच दिये जंगल, बेच दिये पहाड़।


राजीव नयन बहुगुणा और हम इसे रोक भी नहीं सकते।तराई और पहाड़ को बनाने वालों की संतान संततियों का यह वर्तमान है और भविष्य भी यहीं।देश को बनाने वालों,बचानेवालों का भी हश्र यही।


पहलीबार लगा कि हमारे गिरदा की भी ब्रांडिंग होने लगी है।


हमारे पुरखों,हमारे सहयोद्धाओं के संघर्ष की विरासत से भी हम अपनी जमीन,आजीविका ,कारोबार,जल,जंगल,नागरिकता और मनुष्यता की तरह बेदखल हो रहे हैं और हमारी संवेदनाएं अब कंप्य़ूटरों के साफ्टवेअर हैं या फिर एंड्रोयड मोबाइल के ऐप्पस।


पहलीबार लगा कि हमारी सामाजिक संरचना,हमारी सभ्यता और हमारी मातृभाषा और संस्कृति बेदखल खुदरा बाजार की ईटेलिंग हैं।


पहलीबार लगा कि वरनम वन अब सीमेंट का जंगल है जहां चप्पे चप्पे पर कैसिनोदंगल है।जमीन जल जंगल बेचकर करोड़पति बने लोगों के वर्चस्व तले दबे पहाड़ हैं तो आपराधिक राजनीति और निरंकुश बाजार के चंगुल में तेजी से नगर महानगर में बदलते हुए जख्मी लहूलुहान गांवों में हरे अनाकोंडा का डेरा है,पता नहीं कब किसे निगल जायेे।


पहलीबार लगा कि इस गांव में,इस जनपद में हमारी कोई जगह नहीं है और महानगरों से हमारी वापसी नामुमकिन है


हम इसी परिदृश्य में पर्यावरण सेनानी सुंदर लाल बहुगुणा से मिलने उनके बेटी के घधर देहरादून चले गये ताकि पर्यावरण और कृषि के भूले बिसरे मुद्दों पर उनके नजरिये के मुताबिक फिर एक और प्रतिरोध का विमर्श शुरु हो।


बसंतीपुर से लेकर बिजनौर,नैनीताल से लेकर नई दिल्ली में हमारी बेटियों,बहुओं और माताओं ने अपनी सामाजिक सक्रियता और सरोकारों से मुझे बार बार चौंकाया है,हम आहिस्ते आहिस्ते उनके बारे में भी लिखेंगे।


नैनीताल,रूद्रपुर, बिजनौर,देहरादून होकर आज दोपहर ढाई बजे कश्मीरी गेट उतरा।


इसबार बहन वीणा या भाई अरुण के यहां जाने के बजाये सीधे प्रगति विहार हास्टल के बी ब्लाक में राजीव के नये डेरे पर चला आया।


राजीव पहले ही कोलकाता से तंबू उखाड़कर दिल्ली में विराजमान है तो बच्चे भी अब दिल्लीवाले हो गये ठैरे।


गोलू और पृथू जी के पीसी पर काबिज हूं।


कल दोेस्तों से मुलाकात के अलावा वीरेनदा से मिलना है और परसो फिर वही दुरंते कोलकाता।फिर बची खुची नौकरी चाकरी।


दिल्ली आकर पीसी पर बैठने से बहले कोलकाता से आनंद तेलतुंबड़े जी का फोन आया कि पिता के निधन की वजह से वे मुंबई में थे। इसीलिए संपर्क में नहीं थे।इस बीच कई बार बीच बहस में बतौर व्याख्य़ा आनंदजी से संपर्क साधने की कोशश भी करता रहा,संभव नहीं हुआ,क्यों, आज जाना।


सीनियर तेलतुंबड़े जी लंबे अरसे से बीमार चलस रहे थे। लेकिन उनका इस तरह जाना बेहद खराब लग रहा है।उन्हें हमारी श्रद्धांजलि।


हम सविता के मायके से बिजनौर होकर दिल्ली पहुंचे। उनका मायका धर्मनगरी स्वर्गीय धर्मवीर जी का गांव है जिसकी जमीने गंगा के बांध में शामिल हैं।गंगा बैराज संजोग से देश के सबसे समृद्ध कृषि जनपदों मेरठ और मुजफ्फरनगर जिलों को भी धर्मनगरी के सिरे से जोड़ता है।


इसी बिंदू पर जब भी मैं सविता के यहां आता हूं इन तीन जिलों के किसी भी कृषि वैतज्ञानिक के मुकाबले खेती के ज्यादा जानकार किसानों के व्यवहारिक ज्ञान के मुखातिब होता हूं।


सविता का भतीजा रथींद्र विज्ञान का छात्र रहा है।खेती बाड़ी करता है और पंचायत प्रधान भी रहा है।उससे और उसके साथियों से हमारी फसलों ,बीज,जीएम सीड्स,कीटनाशकों,उर्वरकों से लेकर इस क्षेत्र में जीवनचक्र जैव प्रणाली और खादर में पाये जाने वाले हरे एनाकोंडा सांपों के बारे में भी चर्चा हुई।


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने आधुनिकता को अपनाया है लेकिन हरित क्रांति का अंधानुकरण नहीं किया है।उन्हें बाजार के हितों और खेती की विरासत के बीच केे संबंधों को साधने की कला आती है।


इसी इलाके में बासमती शरबती,हंसराज,तिलक जैसे देशी धान की खेती अब भी होती है और यहां के किसानों अपने बीजों की विरासत की विविधता मौलिकता छोड़ी नहीं है,यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात है।उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल की दक्षता भी उनकी हैरतअंगेज है।


इस बार की यात्रा के दौरान बसंतीपुर से लेकर तराई और पहाड़ के मौजूदा हालात के विचित्र किस्म के अनुभव भी हुए तो देहरादून में मौलिक पर्यावरण आंदोलनकारी व वैज्ञैनिक परम आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा ने करीब 35 साल के बाद हुई मुलाकात के बाद भी मुझे पहचान लिया और घंटों सविता और मुझसे इस अंतरंगता से बात की कि मैंने राजीवनयन को कहा कि वे सिर्फ तुम्हारे ही नहीं हमारे भी बाबूजी हैं।


हमने जो उत्तराखंड,उत्तरप्रदेश और दिल्ली में हाल फिलहाल महसूस किया और बाकी देश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय मुक्त बाजार में बेदखल जल जंगल जमीन पर्यावरण और मनुष्यता के बारे में महसूस करते रहे, उसे सुंदर लाल बहुगुणा जी ने हैरतअंगेज ढंग से रेखांकित किया है।


हम सोच रहे थे कि राजीवनयन दाज्यू के पास रिकार्डिंग की व्यवस्था होगी जो थी नहीं,इसके अलावा विमला जी के साथ जुगलबंदी में भारतीय कृषिनिर्भर पर्यावरण और अर्थव्यवस्था और ग्लोबल जलवायु पर्यावरण मुद्दों पर जो सुलझे विचार उन्होंने व्यक्त किये,उसवक्त राजीव नयन दाज्यू मौके पर हाजिर ही न थे।


नतीजा यह हुआ कि मोबाइल मामले में अनाड़ी हमने जो भी रिकार्ड करने की कोशिश की,रथींद्र ने बताया कि वह कुछ भी रिकार्ड नहीं हुआ।लेकिन हमारे दिलोदिमाग पर वे बातें अब पत्थर की लकीरें हैं।


जैसे सुंदरलाल जी ने कहा कि हिमालय में भूमि उपयोग के तौर तरीके बदले बिना इस उपमहादेश में भयंकर जलसंकट होने जा रहा है,जिसका असर पूरी दुनिया पर होगा।


हम इन मुद्दों पर गंभीरता से सिलसिलेवार चर्चा करेंगे।


हमने हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा को जिसतरह पथरीले जमीन में तब्दील होते महसूस किया,जैसे रामगंगी की हालत देखी धामपुर के पास,जैसे यमुना नदी को दिल्ली में ररते सड़ते हुए महसूस किया,वह पुरानी टिहरी के बांद में दम तोड़ते देखने या जलप्रलय की चपेट में केदार में लाशों का पहाड़ दरकना देखने से कम भयावह नहीं है।


जो बेहिसाब निर्माण और जमीन डकैती सर्वत्र जारी है,जो निरंकुश प्रोमोटर बिल्डर राज तराई,पहाड़.पश्चिम उत्तर प्रदेश और पराजधानी नई दिल्ली में भी देखा है,वह भारतीय कृषि,भारतीय अर्थव्यवस्था, देशज कारोबार,उद्योग धंधे,मातृभाषा,शिक्षा,संस्कृति और सभ्यता की मृत्युगाथा है।


अनाकोंडा सिर्फ लातिन अमेरिका में नहीं होते।


अनाकोंडा शुक्रताल से लेकर गंगा के खादर क्षेत्र में भी होते हैं।हरे रंग के वे अनाकोंडा उतने ही खतरनाक हैं जितने अमाजेन की बहुराष्ट्रीय ईटेलिंग और अमेजन की सर्प संस्कृति।


अनाकोंडा परिवार यह लेकिन हमारी हरित क्रांति है।


भारतीय अनाकोंडा भी हरे हरे होते हैं और गंगा की गहराइयों में अनाकोंडा के इस बसेरे पर नेशनल जियोग्राफी,वाइल्ड लाइफ और डिस्कावरी में भी चर्चा नहीं होती।


पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों को लेकिन इन हरे अनाकोंडाओं के बारे मेँ खूब मालूम है  और उन्होंने तराई,पहाड़ और बाकी देश की तरह कृषि की हत्या में अब भी कोई भूमिका निभाने से इंकार के तेवर में हैं।


अपने खेत छोड़़ने को अब भी वे तैयार नहीं है और खेती की खातिर वे राजधानी दिल्ली का कभी भी घेराव कर सकते हैं।


हम खाप पंचायतों के मर्दवादी तेवर का किसी भी तरीके से समर्थन या महिमामंडन नहीं कर सकते लेकिन खेतों खलिहानों के हक हकूक की लड़ाई में इन खाप पंचायतों की सामाजिक क्रांति को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते।


उऩके इस खाप पंचायती तेवर को आप चाहे कुछ भी कहें, भारतीय कृषि को  मुक्त बाजार के मुकाबले,बहुराष्ट्रीय रंगबिरंगे अनाकोंडाओं के देहात की गोलबंदी और उसकी ताकत का मुशायरा भी ये खाप पंचायतें हैं।


आदिवासी इलाकों में भी सामाजिक संरचना बाजार के डंक का असर न होने की वजह से ही जल जंगल जमीन की लड़ाई इतनी तेज हैं वहां।


बाकी देश में सामाजिक संरचना का ताना बाना छिन्न भिन्न है और समाज देश को जोड़ने का कोई जनांदोलन जनजागरण कहीं भी नहीं है और न खाप पंचायतों की जैसी मजबूत कोई सामाजिक संरचना बची है।उलट इसके बाजार की नायाब हरकतों के संग संग राजनीति और महानगरीय मेधा आइकानिक सिविल सोसाइटी हर तरीके से समाज परिवार अस्मिताओं को और भी ज्यादा काट काटकर देश को मल्टीनेशनल आखेटगाह बना रही हैं।


इसलिए बेदखली का कोई सामाजिक सामूहिक विरोध अन्यत्र संभव भी नहीं है।खाप पंचायतों के इस मुक्त बाजार विरोधी तेवर को नजरअंदाज करके हम सामाजिक गोलबंदी के लिए लेकिन पहल कोई दूसरी कर नहीं सकते


बाकी समुदायों और बाकी समाज में प्रगति का जो पाखंड है,वही है मुक्त बाजार और बुलेट हीरक चतुर्भुज का डिजिटल देश।


बाकी चर्चा फिर आनलाइन होने की हालत में।


Thursday, October 23, 2014

উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি কি এখন শুধুই বাজার? আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার। সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই। সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন। পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই। উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি। কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো , জানিনা। পলাশ বিশ্বাস

উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
কি এখন শুধুই বাজার?
আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো , জানিনা।

পলাশ বিশ্বাস


সাত বছর পর উত্তরাখন্ডে বাঙালি উদ্বাস্তু উপনিবেশ দিনেশপুরে ফিরে নিজেকে
আউটসাইডার মনে হচ্ছে।

বাসন্তীপুরে নেজির বাড়ির সামনে দাঁড়িয়ে আমি এবং সবিতা থ,নিজের বাড়িই
চিনতে পারছি না।

কাঁচা মাটির দেওয়ালে গাঁথা গাছ গাছালিতে ভরা বাড়ি আর নেই।
ভাইপো টুটুল পাকাবাড়ি বানিয়েছে দোতলা।

দিনেশপুরে আশেপাশের সব গ্রাম এখন দিনেশপুর শহরের মধ্য়ে।

ছত্রিশ বাঙালি গ্রামের আশে পাশে প্রতিটি উদ্বাস্তু গ্রামের পাশে আরও অনেক
বাঙালি গ্রাম।

পুরাতন উদ্বাস্তু কলোনি এবং একাত্তরের পরে যারা এসেছেন ,তাঁরা সকলেই তরাই
অন্চলে জম জায়গা খুইয়ে পরিবর্তে লাখোলাখ টাকা নিয়ে বাড়ি গাড়ি হাঁকিয়ে
প্রতেকেই মহারাজা।

তাঁরা এখন আমায় চিনতে ও পারছেন না।

বাঙালি গ্রামগুলির বুকে এক এক গজিয়ে উঠছে কল কারখানা,নলেজ ইকোনামির নানা
রং বেরং প্রতিষ্ঠান,শপিং মল,হাসপাতাল,আবাসিক কলোনি,বাজার আরো বাজার।

কাল গিয়েছিলাম রুদ্রপুর ট্রান্জিট ক্য়াম্পে,যেখানে এক একড় জমি বিক্রি
করে এক কোটি টাকা পেয়ে প্রত্যেকটি পরিবারই কোটিপতি।

তাঁদের পুনর্বাসনের লড়াই লড়েছেন বাবা,সঙ্গে যতদিন পেরেছি থেকেছি আমি।

সেই ছোটবেলা থেকে প্রতিটি পরিবারে আমার আনাগোনা।
আমি ছিলাম তাঁদের নয়নের মণি।

আজ তাঁরা আমায় চিনবেন না।

আমি কোন ছার ,যে রবীন্দ্রনাথ, নেতাজি, বন্কিম, শরত,
বিবেকানন্দ,নজরুল,ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের পরিচয়ে পাহাড়ে তরাইয়ে তাঁরা
পরিচিত ছিলেন একদা,সেই তাঁদেরও ভুলেছেন তাঁরা।

তাঁরা ভুলেছেন রবীন্দ্র সঙ্গীত,ভুলেচছেন নজরুল সঙ্গীত,অধিকাংশই বাংলায়
কথা বলতে পারেন না।

তাঁরা ভুলেছেন তাঁদের সংগ্রামের,জমির লড়াইয়ের ইতিহাস,ভুলেছেন পুলিনবাবুকে।

যে মুর্তি তাঁরা পুলিনবাবুর গড়েছিলেন,সেই মুর্তির এখন হাত ভাঙ্গা।
আমার ভাইঝি নিন্নি বলল,দাদুর হাতে ফ্রাক্চার।
সব মুর্তিই গড়া হয় বিসর্জনের জন্য়।
আমাদের আবেদন পুলিনবাবুর মুর্তিখানিও বিসর্জনে যাক।
তাঁকে মুক্তি দিলেই হয়।
এই বাঙালি উপনিবেশে পুলিনবাবূ মরেছেন তেরো বছর আগে,তাঁকে বাঁচিয়ে রাখার
প্রয়োজন নেই যখন এই বাঙালি উপনিবেশে বাঙালিয়ানা বলতে দুর্গোত্সব আর
কালিপুজো ছাড়া কিছুই বেঁচে নেই।
বাঙালি গ্রাম একের পর এক কারখানা হয়ে যাচ্ছে।
আমার গ্রাম এখনো বেঁচে আছে,আগামি বার ফিরব যখন,তখন হয়ত দেখতে পাব আমার
গ্রাম বাসন্তীপুরও আস্ত একটি বাজার বা একটি কারখানা।
এই বাজারে আমার নিঃশ্বাস বন্ধ হয়ে যায়।
আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো ,জানিনা।
একজন এমবিবিএস ডাক্তার হচ্ছেনা।
একজন অফিসার হচ্ছে না।
একজন প্রোফেসার হচ্ছে না।
একজন শিল্পী হচ্চে না।
একজন সাহিত্যিক হচ্ছে না।
একজন সাংবাদিক হচ্ছে না।
তবে টাকা হয়েছে প্রচুর।
টাকার গরম হয়েছে প্রচুর।
পরিবর্তে স্বজন হারিয়েছি আমরা।
শহরে কারখানায় আমরা শ্রমজীবী বাঙালি হয়ে রয়েচি।
উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
কি এখন শুধুই বাজার?

Wednesday, October 22, 2014

কালীপূজা আদিম হিংস্রতার পৈশাচিক প্রজেকশন ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন

বাংলায় পুরুত প্রভুরা কি বেশি রকমের বাঙালি(অসুর) বিদ্বেষী? তারা কি অন্যান্য প্রদেশের ভূদবতাদের থেকে বেশী রক্ত পিপাসু? তা না হলে ধর্মের নামে বাঙালি নিধনের এমন ঢালাও পরিকল্পনা করলেন  কেন?  কেনইবা হিংসাবিদ্বেষসন্ত্রাস ও নরহত্যার এমন ঢালাও প্রদর্শন টিকিয়ে রাখার জন্য সর্বশক্তি প্রয়োগ করছেন পুরুত প্রভুরা! দুর্গা-কালি পূজার নামে ঢালাও মদের যোগান দেওয়ার ঘোষণা এবং সরকারের প্রধানদের  একে উৎসাহিত করার এমন উন্মত্ততা  কিসের ইঙ্গিত বহন করে ! একি কোন বিকারগ্রস্থতা না ব্যবসায়ী ফন্দি! না আসু কোন প্রলয়ের জন্য বলির পাঁঠার মতো অসুর বাঙালীকে প্রস্তুত রাখা!  যাতে সঠিক সময়ে অসুর বাঙালীর মুণ্ডু দিয়ে আবার ব্রাহ্মন্যবাদী কালীর অভিষেক হতে পারে ! এমন জিঘাংসা,  এমন উন্মত্তা ও ভেদ নীতির সগর্ব আয়োজন পৃথিবীর সভ্য দেশগুলিতে খুঁজে পাওয়া দুরূহ। ঘটনা হলবাংলায় এসব বহাল তবিয়তে চলছেএবং একে মহিমান্বিত করার জন্য সরকারের প্রধানরা পর্যন্ত প্যান্ডেলে  প্যান্ডেলে গিয়ে অসুর বাঙালী নিধনের জন্য শিরা ফুলিয়ে মন্ত্র উচ্চারণ করছেন! শপথ গ্রহণ করছেন, "আসছে বছর আবার হবে" 

বাংলা এখন বর্বরতার আঁতুড়ঘর

আদিম হিংস্রতাবর্বরতা ও পৈশাচিক প্রবৃত্তি নরতত্ব,সমাজতত্ব ও মনোবিজ্ঞানের একটি  বিরলতম অধ্যায়। মানুষের জিনোটাইপ ও ফিনোটাইপের আড়ালে এগুলি কি ভাবে প্রচ্ছন্ন হয়ে আছে তাও গবেষণাগারের সিরিয়াস পরীক্ষা নিরীক্ষার চ্যাপ্টার। পৃথিবীর বিবর্তনের কারণেই হোক বা গতিজাড্যের কারণেই হোক হোমোইরেক্টাস যুগের আদিম বর্বর মানব প্রজাতি বাংলায় কিন্তু কেন্দ্রীভূত হয়েছে এবং যোগ্যতম  প্রজাতি হিসেবে এই বিশেষ শ্রেণির মানুষেরা তাদের বিরলতম প্রতিভা এবং স্বভাবটি ধরে রেখেছে তাদের আচারবিচার ও ধর্মীয় আচরণের মাধ্যমে। নিঃসন্দেহে একটি প্রজাতির ক্ষেত্রে এটি একটি প্রবল গুন। লক্ষণীয় বিষয় এই যেহিংস্রতার এই প্রবল গুনটি তারা অন্য প্রজাতির মধ্যেও সঞ্চারিত করতে সক্ষম হয়েছে। ফলে প্রবৃত্তিটি মানব মজ্জায় ঢুকে গিয়ে একটি স্থায়ী স্বভাবে রূপান্তরিত হয়ে পড়েছে। বিস্তার লাভ করেছে এবং মূলাধারটি জৈব বৈচিত্রের (জাত ব্যবস্থা) আড়ালে সুরক্ষিত হয়ে আছে। এহেন দুর্লভবিরল ও আদিম হিংস্র বিষয়টির জন্যই সম্ভবত বাংলা একসময় গোটা পৃথিবীর গবেষণার কেন্দ্রবিন্দু হয়ে উঠতে চলেছে।     

কালীপূজা এক বীভৎসতার প্রজেকশন 

হাতে ঝুলছে কাঁটা নরমুণ্ড । খড়্গ থেকে ঝরে পড়ছে টাটকা রক্ত । নরমুণ্ডুগুলি থেকে ঝরে পড়া রক্ত পান করছে পিশাচ ও শৃগাল। ইতিউতি পড়ে আছে পুরুষের মুণ্ডহীন ধড়। তিনি "কালী করাল বদনীঅসি,পাশধারিণীবিচিত্র খট্বাঙ্গধারিণীনরমুণ্ড ভূষিতা। তিনি ব্যাঘ্র চর্ম পরিহিতাশুষ্ক মাংস ভৈরবীরূপিণী বিস্তৃত বদনালোল জিহ্বাভীষণা"। লকলকে জিভ দিয়ে চেটেপুটে পান করছেন সেই রক্ত! চোখ বন্ধ করে শুয়ে থাকা শিবের(ঈশ্বর) বুকের উরপ পা তুলে এই তাণ্ডব নর্তন বীভৎসতার প্রতীক নয়! অশুভ শক্তির বিরুদ্ধে শুভ শক্তির বিজয় উল্লাস!

হ্যাএমনটাই মেনে নিতে হবে। নতুবা মান-সম্মান-মুণ্ডু সবটাই যাবে। এই  খট্বাঙ্গধারিণীনরমুণ্ড ভূষিতা, ভৈরবীরূপিণী বিস্তৃত বদনালোল জিহ্বা,  ভীষণা রূপের মাধুরী ও হুংকার ধ্বনি আকাশে বাতাসে উদ্গিরন করেই বাংলায় প্রভুদের বিজয় নর্তন শুরু হয়। রাজাকে বশীভূত করে, রাজ ক্ষমতা ব্যবহার করেই চলে তাণ্ডব নর্তনের রণ দামামা। রাজাকে নর্তকীদের নুপুর নিক্কন ও দেহবল্লরির ফাঁদে ফেলে রাজগুরু, রাজপুরোহিত, পণ্ডিত ও কবিরা মিলে রচিত করেন নরহত্যার বিজয় আলেখ্য। এই মহিমা কীর্তনগুলি লিপিবদ্ধ হয় পৌরাণিক কাহিনী রূপে। বিদ্যাপতির কালিকা পুরাণ এমনি এক আলেখ্য যেখানে দুর্গা বা কালীপুজা কি ভাবে কারা উচিৎ তার বর্ণনা দেওয়া হয়েছে।          

বিদ্যাপতি শবরোৎসবের উদাহরণ দিয়ে বলেছিলেনঃ  'কুমারীবেশ্যানর্তকীদের নিয়ে শঙ্খতূর্য,মৃদঙ্গঢোল বাজিয়ে বহুবিধ ধ্বজা বস্ত্র সহ খৈফুল ছড়িয়েপরস্পরের প্রতি ধুলো কাঁদা ছিটিয়ে ক্রীড়া ও কৌতুক গান করতে করেতে যাত্রা করবে। ভগলিঙ্গযৌনউত্তেজক গান এবং তদৃশ্য বাক্যালাপ করে আনন্দ করবেএই সময় যে ব্যক্তি অশ্লীলতা ভালোবাসেনা বা নিজেও অপরের বিরুদ্ধে এরূপ শব্দ ব্যবহার করেনা ভগবতী ক্রুদ্ধ হয়ে তাকে শাপ দেবেন এবং বিনাশ করবেন'

বৃহদ্ধর্ম পুরাণেও এই শবরোৎসবের বর্ণনা আছেঃ

'ভগ লিঙ্গাভিধানৈশ্চ শৃঙ্গার বচনৈ স্তথা 

গানং কার্যং ভোজয়চ্চ ব্রাহ্মনাৎ স্তোষয়েস্ত্রিয়া'

 বৃহদ্ধর্ম পুরাণ ২২ অধ্যায় ২০-৩০পৃ )

ভূদেবতাদের কি অপূর্ব মহীমা! নাচ, গান, পান ভোজন এবং ভগলিঙ্গ সহ  মধুর ভাষণের মাধ্যমে স্ত্রীলোক দ্বারা তাদের তুষ্ট করার এই বিধানের মধ্যে দিয়ে তারা বুঝিয়ে দিলেন যে, " ভর্গো দেবস্য ধীমোহী, ধীয়োযোনা প্রচোদায়ৎ"।                

দ্বিজ রামপ্রসাদ তার গানের মধ্যে কিন্তু প্রশ্ন করে বসেছিলেন, 'বসন পর মাবা 'শিব কেন তোর পদতলেমুণ্ডু মালা কেন গলে'। কি জানি হয়তো সমস্ত মাতৃ জাতীর প্রতি  এমন কদর্য ইঙ্গিত বা যৌনতার এমন ঢালাও ব্যবস্থা  তিনি  মেনে নিতে পারেননি। আজও কালী পূজার সময় পান্নালাল ভট্টাচার্যের গলায় তার এই আকুতি আমরা শুনতে পাই। কিন্তু পান ভোজন ও আদিমতার নেশায় মত্ত বাঙালির কাছ থেকে তার আকুতির কোন উত্তর পাওয়া যায়না। একেবারে রক্তের মধ্যে মিশে যাওয়া বা মজ্জাগত শ্বাপদ স্বভাবের তাই কোন পরিবর্তন লক্ষ্য করা যায়না।      

কিন্তু এমন নগ্ন যৌনতা ও বীভৎস কালী মূর্তি কেন রচনা করলেন বাংলার  পণ্ডিত প্রবরেরা! কালচক্কযানি "তারা" যিনি গোতমা বুদ্ধের জীবিতাবস্থায় সমগ্র এশিয়া খন্ডে পূজনীয়া হয়েছিলেন। আজো যাকে প্রজ্ঞা ও পারমিতার সর্বোচ্চ সম্মান দেওয়া হয় তার প্রকৃত অর্থ তারা বুঝতে অসমর্থ হয়েছিলেন!  না চৌর্য বৃত্তিকালে "তারার" মহিমাকে বিকৃত করে একান্ত ভাবে তাদের আদিম বিকারগুলিকে ধর্মের মোড়কে বেঁধে দিলেন। মদ-গাঁজাসিদ্ধি-ভাং ও চুল্লু-তাড়ির নেশা ধরিয়ে জনগণকে বুদ করে রেখে নিজেদের বর্ণশ্রেষ্ঠ হিসেবে  সুরক্ষিত করলেন!

ভাবীকালের গবেষকেরা নিশ্চিত এ নিয়ে বিস্তর পরীক্ষা নিরীক্ষা করবেন। ম্যান মিউজিয়ামের এমন উর্বর ক্ষেত্র হিসেবে বাংলা সেদিন হোমো- ইরেক্টাস জামানার আদিম হিংস্রতার জন্য বিশ্ব মানচিত্রে জায়গা করে নেবে। কিন্তু ততদিন তো চালিয়ে যাওয়া যেতে পারে কালিকা পুরাণের সাজেশন। তাইতো আবেগ মোহিত গলায় মুখ্যমন্ত্রীর গলায় চণ্ডী পাঠের ফোয়ারা ছোটে। কোল্লামখুল্লা প্রোমোদের জন্য মদগাঁজাচুল্লুর ঢালাও জোগানের ফরমান জারি হয়। বেঁচে থাক ব্রহ্মন্যবাদ। বেঁচে থাক আদিম হিংস্রতার পৈশাচিক প্রবৃত্তি।                                       

 

বিষয়ঃ সংবিধান দিবস সমারোহ

বিষয়ঃ সংবিধান দিবস সমারোহ

প্রিয় সাথী,

মানুষের জন্য, মানুষের দ্বারা মানুষের কল্যাণ সাধন করাই গণতন্ত্রের মূল বাণী। ভারতের সংবিধানের প্রস্তাবনায় এই মহান সংকল্প গ্রহণ করে সংবিধান প্রনেতাগণ ভারতের জনগণকেই গণতন্ত্রের মূলাধার এবং ভারত রাষ্ট্রের সার্বিক উন্নয়নের ভাগীদার হিসেবে মর্যাদা দিয়েছেন এবং দেশ রক্ষার সুমহান দায়িত্ব অর্পণ করেছেন।

 

কিন্তু অত্যন্ত দুঃখের সাথে জানাচ্ছি যে বিগত ৬৫ বছর ধরে দেশে যেসব সরকার প্রতিষ্ঠিত হয়েছে তারা এই দায়িত্ব পালন করতে ব্যর্থ হয়েছে। উপরন্তু তারা অসদুপায়ে  জনাধারকে প্রভাবিত করে রাষ্ট্র ক্ষমতায় আসীন হওয়ার পর জনগণের উপরই খড়গহস্ত হয়ে উঠেছে বারবার। জনগণের পরিবর্তে পুঁজিপতিদের স্বার্থ রক্ষার  কাজেই তারা বেশী মনযোগী হয়ে উঠেছে। ভারতের সংবিধান  রাষ্ট্রের সম্পদগুলির উপর জনগণের যে ভাগীদারী সুনিশ্চিত করেছিল তা খর্ব করে দেশী বা বিদেশী পুঁজিপতিদের হাতে রাষ্ট্রকেই গচ্ছিত করে দিয়েছে এই সরকারগুলি। ফলে ক্ষুধা, দারিদ্রতা,  অনাহারে মৃত্যু, বেকারত্ব, বঞ্চনা প্রভৃতি অমানবিক অসুখগুলি রাষ্ট্রকে জর্জরিত করে তুলেছে। বেড়েছে অসন্তোষ, বিশৃঙ্খলতা, সাম্প্রদায়িক হানাহানি। দুর্বল করে তুলেছে সংবিধানের ভীত। বিপন্ন হয়ে পড়েছে গণতন্ত্র। রাষ্ট্র স্বৈরাচার,  নৈরাজ্যবাদ, ফ্যাসিবাদ ও সন্ত্রাসবাদের দিকে ক্রমান্বয়ে এগিয়ে চলেছে। যা মহান ভারতরাষ্ট্রের সামাজিক, সাংস্কৃতিক ও বৌদ্ধিক পরম্পরার সাথে এক গভীরতর ষড়যন্ত্র।

 

আমাদের সংহতি ও সচেতন প্রয়াসই এই ষড়যন্ত্রের থেকে রাষ্ট্রকে মুক্ত করতে পারে। আসুন আগামী ২৬শে নভেম্বর ২০১৪, ভারতীয় সংবিধানের ৬৫ বছর পূর্তি উপলক্ষ্যে "সংবিধান দিবস সমারোহ" পালন করে আমরা ভারতরাষ্ট্রের সার্বভৌমত্ব ও গণতন্ত্র রক্ষার জন্য লাগাতার সংগ্রামের জন্য শপথ গ্রহণ করি।

এই "সংবিধান দিবস সমারোহ" কে সার্বিক ভাবে সফল করে তোলার জন্য আগামী ৯ই নভেম্বর ২০১৪, সকাল ১০টা থেকে Buddha Dharmankur Sabaha(Bengal Buddhist Association), 1 Buddhist Temple Street. Kolkata- 700 o12  এর সভাকক্ষে একটি প্রস্তুতি সভার আয়োজন করা হয়েছে। একজন সচেতন দেশপ্রেমিক নাগরিক হিসেবে সবান্ধবে এই সভায় উপস্থিত থাকার জন্য আপনাকে সাদর আমন্ত্রণ জানাচ্ছি।

সংগ্রামী অভিনন্দন সহ

তপন মণ্ডল           ঃ ৯৪৩৪০৪০৭২৮

অস্তিসু রূপোয়া ও     ঃ ৮৪২০৮৪৯৫৪২            

শরদিন্দু উদ্দীপন      ঃ ৯৪৩৩৩৪২৪৮৮      

দায়মুক্তি পাচ্ছেন ক্ষমতাসীনেরা :ছাড় পাচ্ছেন না বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা

দায়মুক্তি পাচ্ছেন ক্ষমতাসীনেরা :ছাড় পাচ্ছেন না বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা


http://epaper.prothom-alo.com/contents/2014/2014_10_23/content_zoom/x2014_10_23_1_3_b.jpg.pagespeed.ic.cFUwW0qPsH.jpg

দুর্নীতি দমন কমিশন (দুদক) যেন অনেকের জন্য দুর্নীতি থেকে দায়মুক্তির কমিশনে পরিণত হয়েছে। 'অভিযোগের আমলযোগ্য তথ্য-প্রমাণ না পাওয়ার কারণে' দুর্নীতির অভিযোগ থেকে একের পর এক দায়মুক্তি পাচ্ছেন সরকার-সমর্থিত রাজনীতিবিদ, প্রভাবশালী আমলা ও বিত্তশালী ব্যক্তিরা। দায়মুক্তির ঘটনাগুলো বিশ্লেষণ করলে দেখা যায়, অনেক ক্ষেত্রে দৃশ্যমান প্রমাণ থাকলেও দুদকের কর্মকর্তারা কোনো প্রমাণ পাননি। নির্বাচন কমিশনে নিজেদের দেওয়া হলফনামায় আর্থিক অনিয়মের প্রমাণ থাকলেও 'ভুল হয়েছে' অজুহাত গ্রহণ করে দেওয়া হয়েছে দায়মুক্তি। অবশ্য বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা দায়মুক্তির কোনো সুযোগ পাননি।

চলতি বছরের জানুয়ারি থেকে আগস্ট পর্যন্ত আট মাসে এক হাজার ৫৯৮ জনকে দুর্নীতির অভিযোগ থেকে দায়মুক্তি দিয়েছে দুদক। এ সময়ে ৯০৪টি দুর্নীতির অভিযোগের মধ্যে ৮৭০টিতে কোনো মামলাই হয়নি।

http://www.prothom-alo.com/bangladesh/article/351838/%E0%A6%A6%E0%A6%BE%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A6%AE%E0%A7%81%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A6%BF-%E0%A6%AA%E0%A6%BE%E0%A6%9A%E0%A7%8D%E0%A6%9B%E0%A7%87%E0%A6%A8-%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A6%AE%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A7%80%E0%A6%A8%E0%A7%87%E0%A6%B0%E0%A6%BE

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बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है। गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते। पलाश विश्वास

बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।

गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते।

पलाश विश्वास


कई दिनों बाद आज फिर भाई देवप्रकाश और उनके भांजे पिंटू के सौजन्य से आमलाइन हूं।उधमसिंहनगर जिले के जिला मुख्यालय रुद्रपुर शहर के बगल में पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थियों के लिए बसाये गये ट्रांजिड कैंप में बैठा हूं।जो अब सिडकुल के शिकंजे में हैं और यहां का हर शख्स अपनी जमीन खोकर करोड़पति है और शरणार्थी कालोनियां बेशकीमती उपभोक्ता बाजार में तब्दील है।


घर बसंतीपुर से कैंप के बीच हिंदूजा का सबसे बड़ा कारखाना अशोक लेलैंड और सिंगुर प्रकरण के बाद पंतनगर स्थानांतरित टाटा मोटर्स का प्लांट यहां हैं।जहां नैनो लेकिन बनती नहीं है,नैनो मोदी के सानंद से बनती है लेकिन यहं छोटा हाथी निकलता है कारखाने से।


सारी तराई शहरीकरण और औद्योगीकरण की सुनामी में है और जंगल तो खत्म हो ही गया हैं,गन्ने के खेत रास्ते में कहीं मिल नहीं रहे हैं।


एक के बाद एक गांव के लोग लाखों करोड़ों में जमीन बेचकर रईस बनने के चक्कर में भिखारी बनते जा रहे हैं और संस्कृति पूरी तरह हिंग्लिश रैव पार्टी है।


इसके बावजूद बिजली अब नियमित लोड शेडिंग हैं और उत्तराखंड में अविरत बिजली किंवदंती ध्वस्त है तो गांव गांव तक पहुंचने वाली सड़कें खंडहर हैं।


बची खुची खेती में मिट्टी बालू की खदानें हैं।


यही मेरा डिजिटल देश महान है।


यह परिदृश्य तराई में सीमाबद्ध है.ऐसा भी नहीं है।


कल ही नैनीताल होकर आया हूं।


पहाड़ के चप्पे चप्पे में विकाससूत्र की धूम है।अब तो पेड़ों के टूंठ भी कहीं नजर नहीं आते। तराई से लेकर पहड़ा तक नालेज इकोनामी के तहत गांव गांव में कालेज,मेडिकल कालेज,बीएच कालेज,इंजीनियरिंग कालेज,ला कालेज खुल गये हैं।


इंग्लिश कुलीन स्कूल कालेज तो मशरूम है।


कोई नियंत्रण नहीं है।कोई नियमन नही है।

बेलगाम पूंजी,मुनाफाखोरी और कमीशनखोरी का खुल्ला बाजार है।


जो बच्चों का हुजूम बड़ी उम्मीदों के साथ इस शिक्षण संस्थानों से निकल रहा है,उनका आखिरकार होगा क्या,जो किसान बेदखल हो रहे हैं,उनका आखिर होगा क्या,इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


दिनेशपुर.ट्रांजिट कैंप से लेकर नैनीताल तक बाजारों में सारे के सारे चेहरे अजनबी हैं।जहां तहां शापिंग माल है।


स्थानीय लोग पक्के मेहनतकश हो गये हैं और व्यापारियों के एक खास तबके को अपना सबकुछ हस्तांतरित करके ऐश कर रहे हैं मौत के इंतजार में।


नैनीताल के लिए काठगोदाम से पहाड़ चढ़ते हुए पहाड़ के रिसते जख्मों से जो खून की धार निकलती रही,उसे अभी दिलोदिमाग से साफ नहीं कर पाया हूं।


अपना नैनीताल भी तेजी से गांतोक नजर आने लगा है।


तल्ली डाट सुनसान है तो कैंट बाजार का कायाकल्प हो गया है।मल्लीबाजार की दुकानें अजनबी हैं तो फ्लैट्स की घेराबंदी है।


तल्ला डांडा और अय़ांर पाटा अब आलीशान हैं और सूखाताल,भीमताल,खुरपाताल तक विकास का कदमताल है और बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।


कल सुबह गिरदा की पत्नी हीराभाभी से तल्ली डाट के बगल में हल्द्वानी रोड पर उनके नये कमरे में सविता और मेरी लंबी बातें होती रहीं।


हीरा भाभी, बोली कम रोयी ज्यादा।उन आंसू की हिस्सेदारी लेकिन हमारी हैं नहीं।


बटरोही से माउंट रोज में उनके घर जाकर हमने पूछा कि गिरदा की कितनी किताबें कोर्स में लगी हैं।बोले ,एक भी नहीं है।लगायेगा कौन,उन्होंने पूछा।


हीराभाभी चाहती हैं कि गिरदा की स्मृति में कोई संग्रहालय बने।


उत्तराखंड सरकार या कुमांयू विश्वविद्यालय चाहे तो यह संभव है।


हीरा भाभी बोलीं कि गिरदा की किताबें और उनका सारा सामान अल्मोड़ें में उनके पुश्तैनी घर में बाथरूम के सामने गली में बक्से में बंद छोड़ आयी हैं क्योंकि केलाखान के पास गिरदा का घर उन्हें छोड़ना पड़ा।


साढ़े बारह सौ का घर छोड़कर अशोक होटल के ठीक सामने जो साढ़े पांच हजार रुपये के किरोये पर उनका एक कमरे का घर है,जहां वे निपट अकेली हैं,उसमें कोई रसोई भी नहीं है तो किताबें वे कहां रखतीं।


मेरे पिता पुलिन बाबू डायरियां लिखा करते थे रोजय़हर छोटी बड़ी जरुरी गैर जरुरी चीजों को लिखा करते थे।हमारा घर झोपड़ियों का झुरमुट था। कोई खाट तक नहीं थी हमारी और हम फर्श पर सोते थे।एक बड़े से लकड़ी के बक्से में सारे जरुरी कागजात ,जमीन का खसरा खतियान से लेकर ढिमरी ब्लाक आंदोलन के पोस्टर,पर्चे और उनकी डायरियां रखी हुई थीं।बाकी पूरे घर में अनाज और पत्र पत्रिकाओं का डेरा और बाकी सांपों का बसेरा था।छप्पर चूंती रहती थीं।


पिताजी की मौत के बाद स्थिर हुआ तो हमें उस काठ के बक्से की सुधि आयी।पता चला कि पद्दो घर से बाहर था और तब दस बारह साल के भतीजे टुटुल ने बाक्स खोलकर दीमक लगे कागजात डायरियों और उसके भीतर की सड़न से घर को बचाने के लिए उस काठ के बक्से को ही फूंक दिया।


पिताजी की इस तरह दो दो बार अंत्येष्टि हो गयी।


हमारी औकात पिताजी के लिए संग्राहालय बनाने की थी नहीं।


दिनेशपर कालेज के सामने जो मूर्ति बनी है,उसे हर साल नये सिरे से सहेजना पड़ता है क्योंकि रात के अंधेरे में हर साल उस मूर्ति को अनजान लोग तोड़ देते हैं।


इस बार भतीजी निन्नी ने छूटते ही कहा कि दादाजी के हाथ में फ्रैक्चर है।


सविता बोली उनकी पूरी देह ही फ्रैक्चर है।


सविता ने फिर जिम्मेदार लोगों से निवेदन भी किया कि कैश कराने के लिए इस मूर्ति पूजा की जरुरत ही क्या है।


सविता ने कहा कि हर मूर्ति गढ़ी जाती ही है विसर्जित होने के लिए।


मुक्तबाजार हुई जा रही तराई में पुलिनबाबू की स्मृति का क्या मोल।


बेहतर हो कि पुलिनबाबू को विसर्जित कर दिया जाये।

उनको इस यातनागृह से मुक्त कर दिया जाये।


हम जो गिरदा की मूरत गढ़ रहे हैं,बेदखल पहाड़ और बेदखल तराई की भावभूमि में उसकी कितनी प्रासंगिकता है,यह बात मेरी समझ में नहीं आती।


राजीव लोचन साह ने कहा भी कि गिरदा ने जनता से लिया और जनता को लौटा दिया।पोथी रचने की उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।


वे बोले कि गिरदा तो चिरकुट पर लिखने वाला ठैरा।


तो इस हुड़किया लोककवि की ब्रांडिंग करके किसे क्या फायदा होने वाला ठैरा।मुझे आशंका है कि जैसे हम अपने पिता की कोई स्मृति और उनके हिस्से का इतिहास बचा नहीं सकें,उसीतरह हमारे गिरदा को भी घुन और दीमक चाट जाने वाले होंगे।


तुहीन और पिरिम अब दिल्ली में हैं और अनिमित नैकरियों में हैं और भाभी को कुल साढ़े सात हजार रुपये की पेंशन मिलती है।


राजीव,दीपा कांडपाल,शेखर,उमा भाभी निजी तौर पर जितना कुछ कर सकते हैं,कर रहे हैं जो शायद काफी नहीं है।


पवन राकेश का कहना है कि भाभी की आंखों से बहते आंसुओं को हम थाम ही नहीं सकते।


कल दो बजे तक तुहीन को नैनीताल होना था।मुझे घर से पद्दो का जरुरी फोन मिलने की वजह से तुरत फुरत पहाड़ छोड़ आना पड़ा शेखर दा और उमा भाभी से मिले बिना ही।


डीके ,विश्वास,कैप्टेन एल एम साह जैसे अनेक लोगों से बिना मिले।


मैंने हीरा भाभी से कहा कि तुहीन लौटते ही फोन करें और तब हम पता लगायेंगे कि क्या वह किसी अखबार में काम करने को इच्छुक है।होगा तो हम लोग किसी संपादक मालिक मित्र से निवेदन करेंगे कि उसे अखबार का कामकाज सीखा दें।


अभी तक तुहीन का फोन नहीं आया और मैं इंतजार में हूं।


बटरोही और राजीवदाज्यू से संग्रहालय की बात हमने चलायी भी।राजीवदाज्यू ने कहा कि सरकारी नियंत्रण में संग्रहालय का हाल तो महादेवी वर्मा पीठ से मालूम पड़ गया ठैरा,जहां उसे रचने वाले बटरोही को ही खदेड़ दिया गया।


उस दूध के जले बटरोही से भी हमारी माउंट रोज पर उनके मकान में लंबी बातें हुईं और उनसे भी कहा कि संग्रहालय बनाने की पहल आप ही कर सकते हैं।


बटरोही जी कोई जवाब देने की हालत में नहीं थे।


अबकी बार मल्लीताल के सबकुछ बदले माहौल में,इसे यूं समझें की नैनीताल के तीनों सिनेमाहाल विशाल,कैपिटल और अशोक बंद पड़े हैं और नैनीताल में कोई सिनेमाहाल इस वक्त है नहीं।


तो मल्ली बाजार में अपने पुराने शर्मा वैष्णव भोजनालय में करगेती और सुदर्शन लाल शाह सत्तर के दशक के कुछ डीएसबी सूरमाओं से मुलाकात हो गयी और एक दम सत्तर के दशक में लौट गये।


इससे पहले इदरीश मलिक की पत्नी कंवल सेमुलाकात हो गयी जो तराई के ही काशीपुर से हैं तो कोलकाता के भवानीपुर में भी उनकी जड़ें हैं।


इदरीश की गैरहाजिरी में उनसे हुई मुलाकात में वे इतनी अंतरंग हुई कि लगी करने शिकायत कि हम उसके घर क्यों नहीं ठहरे।फिर नैनीताल में हर साल दिखायी जानेवाली राजीव कुमार की फिल्म वसीयत की चर्चा भी हुई जिसमें सारे के सारे नैनीतालवाल देशभर से इकट्ठे हुए थे और संजोग से उस फिल्म की पटकथा,संवाद,इत्यादि मैंने लिखी थी और दो चार शाट मुझपर भी फिल्माये गये थे।


इदरीश अभी फिर मुंबई में है और उसकी दो फिल्में रिलीज होने को हैं,खुशी इस बात की है।


नैनीताल इतना बदल गया है कि फिल्मोत्सव के लिए जगह नहीं मिल पा रही है तो युगमंच के रिहर्सल के लिए भी जगह नहीं है।


फिर भी जहूर आलम की अगुवाई में सत्तर दशक की धारावाहिकता में युगमंच के नये पुराने रंगकर्मी हरिशंकर परसाई के मातादीन को मंच पर उतारने की जुगत में है।


वे रिहर्सल की तैयारी में थे तो उनसे ज्यादा बात नहीं हो पायी।


करीब रात के साढ़े बारह बजे हम मालरोड पर बंगाल होटल पहुंचे जहां मैं करीब पांच साल रुककर पढ़ता था डीएसबी में।एक सा गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी के घर में था।


धड़कते हुए दिल के साथ गया कि पता नहीं कि किससे मुलाकात होगी और किससे नहीं।

बंगाल होटल का कायाकल्प हो गया है।जिस कमरे में मैं रहता था,वह अब मौचाक रेस्तरां है।वहीं हम पूछताछ कर रहे थे तो सीढ़ियों पर दादा सदानंद गुहा मजुमदार आ खड़े हो गये।


पहले उन्होंने ही हमें कस्टमर समझ लिया पर जब सविता ने कहा पलाश तो फौरन डांटते हुए बोले ,एखाने की कोरछिस ऊपरे जा।


ऊपर जाते ही उनकी बेटी सुमा जो 1973 में साल भर की थी .हमें देखते ही चीख पड़ी,मां देखो के एसेछे,पलाश अंकल और फिर भाई को आवाज लगाने लगी -- ओ सभ्यो ओ सभ्यो


दीदी अपने उसी कमरे में थीं।बड़ी बहू कोलकाता के बेलेघाटा से है।उसकी सास ने कहा कुछ नहीं, वह तुरंत किचन में घुस गयी।फिर दोनों के लिए माछ भात लेकर लौटीं।


सविता बोली,इनसुलिन तो अशोक में छोड़ आयी लेकिन तुम्हारे हाथ का जरुर खाउंगी।


छोटी बहू कुंमाय़ुनी और नैनीताल की है।पूछा तो बोली कि आस सेंट्स में टीचर है जैसे सुमा बिड़ला कालेज में है।


मैंने कहा कि हमारी मैडम मिसेज अनिल बिष्ट भी कभी आल सेंट्स में पढ़ाती थी।



इसपर उसके पति गुड्डु सुखमय ने कहा कि वह तो मैडम के साथ काम करता है।


दस बजे गये ते ।फिर भी मैडम को एसएमएस करके उसने हमारे वहा होने की जानकारी दी।दो मिनट के भीतर मैडम फोन पर थीं और हम घंटा भर बातें करते रहे।


करीब रात के साढ़े ग्यारह बजे अशोक में लौटे।सभ्यो गाड़ी से पहुंचा गया।


हल्द्वानी में हरुआ दाढ़ी है तो आज सुबह अमर उजाला देखा तो हल्द्वानी में संपादक हमारे पुराने बरेली के सहकर्मी सुनील साह हैं।


करगेती,भास्कर,कमलापंत और लोग हैं।लेकिन हल्द्वानी मैं रुक नहीं सका।

भास्कर उप्रेती से नैनीताल पहुंचते ही मुलाकात हो गयी,गनीमत है।


गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी इस वक्त मुरादाबाद में हैं।उन्हें प्रमाम करने की बड़ी इच्छा थी।


राजीव लोजन साह ने गुरुजी से फोन पर मिलाया और फोन पर ही सविता और मैंने उन्हें प्रणाम कहकर नैनीताल से विदा ली।


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