THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA INDIA AGAINST ITS OWN INDIGENOUS PEOPLES

PalahBiswas On Unique Identity No1.mpg

Friday, April 6, 2012

अज्ञेय की धूम के पीछे

http://news.bhadas4media.com/index.php/yeduniya/1085-2012-04-06-13-35-39

[LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/1085-2012-04-06-13-35-39]अज्ञेय की धूम के पीछे   [/LINK] [/LARGE]
Written by रविभूषण   Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 06 April 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=76f4420fd34924f45558ff6f3c8efc2266444930][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/1085-2012-04-06-13-35-39?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
पिछले दो-तीन वर्षों में जिस तरह अज्ञेय और उनके साहित्य को फिर से स्थापित करने की कोशिशें हुई हैं, उनसे हिंदी साहित्य पर साम्राज्यवादी वित्त पूंजी के बढ़ते दबाव का पता लगता है. अज्ञेय हिंदी साहित्य में इस उत्पीड़क वित्त पूंजी के केंद्रीय प्रतिनिधि थे. इसीलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि जब साम्राज्यवाद की पैरोकार सरकार देश की आदिवासी-दलित जनता के खिलाफ अपनी सेना और वायुसेना को उतार चुकी है, अमेरिकी और इस्राइली सैनिक निर्देशन में बाकायका युद्ध चला रही है, हिंदी साहित्य में इस पर एकदम चुप्पी है और अज्ञेय का शोर है. यह शोर कथित प्रगतिशील और खुद को नक्सलबाड़ी की विरासत से जोड़नेवाले खेमों में भी दिखता है. इसके बारे में  विस्तार से और भी बातें होंगी, अभी पढ़ते हैं रविभूषण का यह आलेख.

पिछले वर्ष हिंदी के तीन-चार प्रमुख कवियों-शमशेर, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्मशती मनायी गयी और अब भी यत्र-तत्र जो मनायी जा रही है, उनमें आरंभ से अब तक अशोक वाजपेयी और उनके सहयोगियों ने अज्ञेय को शीर्ष स्थान पर रखते हुए उन्हें 'नायक' का दर्जा देने के कम प्रयत्न नहीं किए हैं। ताजा उदाहरण कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी के भाषा भवन के भव्य सभागार में प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा रजा फाउंडेशन और साहित्य अकादेमी के सहयोग से आयोजित त्रिदिवसीय अज्ञेय जन्म शताब्दी समारोह (21-23 फरवरी 2012) है। चालीस-बयालिस वर्ष पहले का समय कुछ और था, जब अज्ञेय के नौवें कविता संकलन 'कितनी नावों में कितनी बार' (1967) की समीक्षा में अशोक वाजपेयी ने अज्ञेय को 'बूढ़ा गिद्ध' कहा था। 'बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए' शीर्षक से लिखित पुस्तक समीक्षा में अशोक वाजपेयी ने यह लिखा था कि अज्ञेय ने 'अपने पुनर्संस्कार की कोई गहरी कोशिश' नहीं की है, कि वे 'गरिमा और आत्मतुष्टि के छद्म से घिर कर, बल्कि उनकी गिरफ्त में आकर' लिखते हैं। उस समय उन्होंने अज्ञेय और पंत में समकालीनता का अभाव देखा था और अज्ञेय के काव्य संसार को 'सुरक्षित और समकालीन दबावों से मुक्त' कहा था। 'उत्सवधर्मिता' को 'कविता का स्थायी भाव' न मानने वाले तब के अशोक वाजपेयी के लिए आज उत्सवधर्मिता आयोजनों का कहीं अधिक महत्व है।

अस्सी के दशक के आरंभ में अज्ञेय ने 'जय जानकी यात्रा' एवं 'भागवत भूमि यात्रा' आरंभ की थी। लगभग इसी समय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने तीन प्रमुख तीर्थ यात्राओं की योजना 16 नवंबर, 1983 से 16 दिसंबर, 1983 तक बनायी थी। एक महीने की यह तीर्थ यात्रा संपूर्ण भारत के लिए थी-गंगाजल या एकात्मता यात्रा हरिद्वार से रामेश्वरम तक, दूसरी एकात्मता यात्रा पशुपतिनाथ से कन्याकुमारी तक और तीसरी एकात्मता यात्रा गंगा सागर से सोमनाथ तक। इन यात्राओं में शामिल होने की अपील एक साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, आर्य समाज, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, जैन संप्रदाय, वैष्णव परिवार, सिख संप्रदाय, बौद्ध संप्रदाय और भारतीय दलित वर्गा संघ ने की थी।1984 से पहले विहिप ने अपने प्रोग्राम में 'राम' के नाम का उपयोग नहीं किया था। ऐसा पहला प्रयत्न उसने 1987 में 'राम जानकी धर्म यात्रा' में किया। इसी वर्ष 4 अप्रैल को अज्ञेय का निधन हुआ। अभी इस पर विचार नहीं हुआ है कि अज्ञेय की 'जय जानकी यात्रा' एवं 'भागवत भूमि यात्रा' से विहिप की 'राम जानकी धर्म यात्रा' और आडवाणी की 'राम यात्रा' (25 सितम्बर 1990) को कोई प्रेरणा मिली या नहीं?

अज्ञेय ने किसी भी राजनेता से ज्ञानपीठ पुरस्कार लेने से इनकार किया था। उन्हें 14वां ज्ञानपीठ पुरस्कार 28 दिसंबर, 1979 को कलकत्ता में नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने दिया था। 'स्टेट्समैन' ने उस समय यह लिखा था कि इस वर्ष एक पत्रकार ने ज्ञानपीठ प्राप्त किया है। अज्ञेय ने 'सैनिक', 'विशाल भारत', 'प्रतीक', 'दिनमान', 'एवरीमेन्स', 'नया प्रतीक' और 'नवभारतटाइम्स' का संपादन किया था। एक सप्ताह पहले कोलकाता में आयोजित त्रिदिवसीय सेमिनार में विचारणीय विषय 'अज्ञेय के सरोकार', 'अज्ञेय के शहर' और 'अज्ञेय की यायावरी' थे। कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध्, पत्रकारिता विषय गायब थे। आयोजकों के लिए ये जरूरी विषय नहीं थे। अशोक वाजपेयी अज्ञेय और शमशेर पर हुए लगभग 200 आयोजनों और इन पर लिखित तीस से चालीस पुस्तकों के प्रकाशन का जब उल्लेख करते हैं, तब किसी की भी यह जिज्ञासा हो सकती है कि 'अज्ञेय के सरोकार' और शमशेर, केदार और नागार्जुन के सरोकार क्या एक हैं और अगर इन कवियों के सरोकारों में भिन्नता है तो वह कहां-कैसी है? अज्ञेय ने ज्ञानपीठ पुरस्कार के अवसर पर दिए वक्तव्य में 'अनुपार्जित धन को विकृति पैदा करने वाला' कहा था। उस समय उनके सामने देश की 'वर्तमान स्थिति' थी जिसमें उन्हें 'ऐसे समारोह संदर्भहीन' लगे थे। कोलकाता वाले हाल के समारोह में उद्घाटन सत्र में केदारनाथ सिंह को बोलने के लिए मात्र तीन मिनट दिए गए थे। उद्घाटन दूसरे दिन हुआ था।

अज्ञेय जन्मशती समारोह में राजनेताओं, अधिकारियों, अभिनेताओं-अभिनेत्रियों की मुख्य उपस्थिति होनी चाहिए या कवियों लेखकों की? कवितापाठ कवियों को क्यों नहीं करना चाहिए? उद्घाटन सत्र में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कोलकाता को देश की सांस्कृतिक राजधानी कहा जबकि बाद के सत्र 'अज्ञेय के शहर' में वक्ताओं-श्रोताओं को मिलाकर कुल पच्चीस लोग उपस्थित थे। दो-तीन हिंदी लेखकों को छोड़ कर कलकत्ता का कोई हिंदी कवि-लेखक वहां उपस्थित नहीं था। अज्ञेय हिंदी के सभी कवियों-लेखकों के 'प्रेरणा पुरुष' नहीं हो सकते। हिंदी की काव्य परंपरा हजार वर्ष की है। सरहपाद से लेकर आज तक मुख्य काव्यधारा जन और लोक से जुड़ी हुई है। अज्ञेय का संपूर्ण साहित्य जन और लोक से विमुख है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से कुछ विशिष्ट जन ही प्रेरणा लेना चाहेंगे। उन्होंने अपनी एक कविता में स्वयं को 'चुका हुआ' कहा है जबकि शमशेर घोषित करते हैं 'चुका भी हूं नहीं मैं' (1970)। अज्ञेय ने काल-चिंतन किया 'संवत्सर' (1978) में पर काल से होड़ शमशेर ने की-'काल तुझसे होड़ है मेरी' (1990)।

अज्ञेय का साहित्य समय और समाज से जुड़ा नहीं है। निश्चित रूप से वे हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक हैं जो अनेक हिंदी कवियों-लेखकों के लिए न जरूरी रहे, न महत्वपूर्ण। उनका साहित्य बौद्धिक और आधुनिक है पर उनकी आधुनिकता देशज और भारतीय नहीं है। वह नेहरू की आधुनिकता से मेल खाती है। अज्ञेय 'नेहरू अभिनंदन ग्रंथ' के संपादक भी थे। अज्ञेय को 'क्रांतिकारी' नहीं कहा जा सकता। वे भगत सिंह और आजाद के साथ कुछ समय तक थे, मेरठ के किसान आंदोलन से जुड़े थे, 1942 में दिल्ली में अखिल भारतीय फासिस्ट विरोधी सम्मेलन के आयोजकों में थे, कुछ समय तक कृशन चंदर और शिवदान सिंह चैहान के साथ भी थे पर 1943 में उन्होंने ब्रिटिश सेना में नौकरी की, असम-बर्मा फ्रंट पर उनकी नियुक्ति थी। जब 1936 में प्रेमचंद साहित्य का उद्देश्य बता रहे थे, अज्ञेय क्रांतिपरक साहित्य को 'थोथा और निस्सार' कह रहे थे। वे जीवन दर्शन के निर्माण में मार्क्सवाद की तुलना में डार्विन, आइंस्टाइन और फ्रॉयड की 'बड़ी देन' मानते थे। जिन कवियों-लेखकों के प्रेरणा पुरुष भारतेन्दु, निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन होंगे, उनके प्रेरणा पुरुष अज्ञेय कभी नहीं हो सकते।

अज्ञेय अशोक वाजपेयी के 'रोल मॉडल' हो सकते हैं। संभव है अशोक वाजपेयी भी कुछ के रोल मॉडल हों। प्रश्न 'अपने-अपने अज्ञेय' का नहीं किसके, कैसे, अज्ञेय का भी है। 6 मार्च, 2011 से रविवारी जनसत्ता में अज्ञेय को लेकर जो बहस हुई थी उसकी अगली और महत्वपूर्ण कड़ी प्रदीप सक्सेना की पुस्तिका ('साम्य' पुस्तिका-14) है-'कहां खडे़ हैं अज्ञेय और क्या कहती हैं उनकी रचनाएं एक वैज्ञानिक प्रतिवाद की जरूरत 2011' अज्ञेय की चिंता में कभी भारतीय जनता नहीं रही है। उन्हें हिंदी का बड़ा और नागार्जुन से श्रेष्ठ घोषित करने वालों की भी चिंता भारतीय जन से जुड़ी नहीं है। नामवर हों या विद्या निवास, शाह हों या आचार्य, अशोक वाजपेयी हों या उनके सहचर। अज्ञेय का साहित्य 'तंत्र' को चुनौती नहीं देता। वह बहुत हद तक 'तंत्र' के साथ है। भारतीय लोकतंत्र में आज 'लोक' नहीं 'तंत्र' प्रमुख है-जो तंत्र से जुड़े हैं उनके साथ हैं, उनके लिए निश्चित रूप से अज्ञेय आधुनिक हिंदी कविता के शिखर पुरुष होंगे।

[B]रविभूषण का यह आलेख हाशिया ब्‍लॉग से साभार लिया गया है.[/B]

No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...