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Saturday, July 7, 2012

दहेज़ उत्पीडन से कब मुक्त होगी स्त्री?

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दहेज़ उत्पीडन से कब मुक्त होगी स्त्री?

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मध्य प्रदेश के सागर जिले से एक ह्रदयविदारक खबर आई है। एक २० वर्षीय युवती को उसके ससुरालवाले दहेज़ की मांग पूरी न कर पाने की वजह से पिछले तीन वर्षों से अमानवीय यातना दे रहे थे। उसे इस अवधि में जंजीरों से बांधकर तबेले में रखा गया। इतना ही नहीं इस दौरान उसके पति, परिजन, ससुरालवालों के साथ ही पड़ोसियों ने भी उसके साथ लगातार तीन वर्षों तक सामुहिक बलात्कार किया। इतने पर भी उसके पति का दिल नहीं भरा तो उसे अपनी पत्नी को गैर मर्दों को कई बार बेचा।

अत्यधिक बीमारी की हालत में अस्पताल से लौटते वक्त किसी पहचानने वाले युवक की नज़र उस युवती पर पड़ी तब जाकर मामले का खुलासा हुआ| प्रथम दृष्टया मामला दहेज़ प्रताड़ना से जुड़ा हुआ है किन्तु मामले से जुडी एक बात जो इसे संदिग्ध बनाती है वह यह कि क्या तीन वर्षों में युवती के परिवार वालों ने उसकी सुध लेने की कोशिश नहीं की? क्या एक पिता का ह्रदय इतना निर्मम हो सकता है कि वह अपने जिगर के टुकड़े की तीन वर्षों तक खोज-खबर ही न ले? क्या एक माँ के लिए ऐसा करना संभव है? एक पत्नी के लिए यह स्थिति कैसी होगी जहां उसका ही पति उसे गैर मर्दों के सामने परोसने पर तुल गया हो?

अपने सभी सगे-संबंधियों को छोड़ जिस व्यक्ति का हाथ थाम वह युवती उसके जीवन में आई थी वह इतना नीच कर्म करेगा, सहसा विश्वास नहीं होता| हालांकि मामला अब पुलिस के पास है और पीड़ित पक्ष को उचित न्याय मिलने की भी संभावना है, किन्तु इस मामले ने दहेज़ प्रकरण व उससे जुडी कुरीतियों की याद ताजा करा दी है| आर्थिक स्वछंदता व आधुनिक जीवन शैली के वर्तमान युग में दहेज़ उत्पीडन के मामले कहीं न कहीं समाज में मौजूद उस विकृत मानसिकता का बोध कराते हैं जिससे पार पाने के कोशिश में कई सदियाँ बीत चुकी हैं किन्तु समस्या जस की तस है।

देखा जाए तो अब दहेज़ उत्पीडन के दो तरह के मामले सामने आने लगे हैं| एक तो वे जो सच में उत्पीडन का शिकार हैं; दूसरे वे जहां झूठे दहेज़ उत्पीडन मामलों में वर पक्ष के लोगों को जानबूझ कर फंसा दिया जाता है| दोनों ही स्थितियां समाज के मानसिक दिवालियेपन को प्रदर्शित करती हैं| हालांकि झूठे दहेज़ उत्पीडन के मामले वास्तविक दहेज़ उत्पीडन के मामलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम हैं| फिर भी कब तक पढ़े-लिखे समाज में युवतियां दहेज़ उत्पीडन का शिकार होती रहेंगीं? आखिर किस मानसिकता के साथ जी रहा है हमारा समाज? क्या कभी इस उत्पीडन के खिलाफ पुरजोर आवाज उठेगी? सवाल अनगिनत हैं लेकिन उनका समाधान भी समाज व पारिवारिक संस्कारों में छिपा हुआ है|

आखिर दहेज़ उत्पीडन की शुरुआत कैसे और कहाँ से हुई? किसकी गलतियों का खामियाजा युवतियों को उठाना पड़ रहा है? विवाह दो व्यक्तियों का ही नहीं दो परिवारों व दो विभिन्न संस्कारों का भी मिलन माना जाता है। एक पिता अपनी पुत्री को भारी मन से अजनबी हाथों में इस उम्मीद से सौंपता है कि वह उसकी पुत्री की हर ख्वाहिश का ध्यान रखेगा। पर जब यह उम्मीद टूटती है तो उस पिता के मन पर कितनी ठेस लगती होगी? विवाह संबंध के दौरान पिता यदि अपनी पुत्री को स्नेह सहित उपहारों सहित ससुराल विदा करता है तो यह उसका अपनी पुत्री के प्रति प्रेम है| किन्तु आज इस प्रेम को दहेज़ का स्वरुप दे इसकी पवित्रता को मलिन किया जा रहा है। देश में हर वर्ष दहेज़ उत्पीडन की वजह से सैकड़ों युवतियों को असमय काल कलवित होना पड़ता है| गाँव ही नहीं पढ़े-लिखे परिवार भी दहेज़ के लिए लालची होते जा रहे हैं या यूँ कहूँ तो पढ़े-लिखे लोग ही दहेज़ को बढ़ावा देने में लगे हैं| वर पक्ष की ओर से नकद राशि के अलावा घरेलू उपयोग की वस्तुओं की मांग भी बढ़ती जा रही है| यही नहीं शादी के कई साल बीतने के पश्चात भी दहेज़ की मांग करना आम चलन हो गया है| जरा सोचिए एक आम परिवार कैसे इन मांगों की पूर्ति कर सकता है?

दहेज़ उत्पीडन के लिए देश में लाख कानूनी प्रावधान हों किन्तु इनका कितना पालन होता है, आप और हम जानते हैं| कहीं सामाजिक वर्जनाओं का डर तो कहीं परिवार के बिखरने का खतरा, एक युवती को सब कुछ चुपचाप सहना पड़ता है| कहीं न कहीं दहेज़ उत्पीडन के बढ़ते मामलों का मुख्य कारण तो युवतियों का मूक होना ही है| हाँ, जब कभी ख़बरों के माध्यम से यह सुनने को मिलता है कि अमुक युवती ने दहेज़ के लालची युवक से शादी करने से मना कर दिया है या लालची ससुरालवाले युवती की शिकायत की वजह से जेल में हैं तो लगता है कि सब कुछ बदलने वाला है पर तभी फिर किसी दहेज़ उत्पीडन की शिकार युवती की दुर्दशा की खबर मन को व्यथित कर देती है।

आदिकाल से चली आ रही उपहारों के लेन देन की प्रक्रिया को दहेज़ का नाम देकर समाज में काबिज भेड़िये पता नहीं कब अपनी लिप्सा की क्षुधा को शांत करेंगे? कभी किसी युवती को जलाकर मार डालना तो कभी अमानवीय यातनाएं देना, क्या पुरुष प्रधान समाज में संवेदनाएं मृत हो चुकी हैं? जिस तेजी से समाज में दहेज़ उत्पीडन के मामले बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि सागर जिले में दहेज़ उत्पीडन की शिकार युवती को न्याय मिलने से पहले कहीं और कोई युवती भी दहेज़ के लालची हाथों द्वारा प्रताड़ित न हो रही हो?

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